संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल आइलैंड्स में 1946 से 1958 के दौरान लगभग 67 परमाणु बम परीक्षण किए थे. प्रशान्त क्षेत्र में स्थित यह द्वीपीय समूह उस दौर की रेडियोधर्मी विरासत और स्वास्थ्य, पर्यावरणीय व सामाजिक दुष्परिणामों को आज भी झेल रहा है.
जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इसी विषय पर गुरूवार को चर्चा हुई, जिसमें अमेरिका से इन परीक्षणों से सम्बन्धित अपने पुराने रिकॉर्ड को साझा और पीड़ितों के लिए हर्जाना सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया.
वैसे तो अमेरिकी परमाणु परीक्षणों का यह सिलसिला 1958 में समाप्त हो गया था, लेकिन इसके बाद भी स्थानीय आबादी के लिए बीमारी, दूषण का शिकार भूमि, जबरन विस्थापन का क्रम कई पीढ़ियों तक चलता रहा. इस नुक़सान की भरपाई की मांग भी निरन्तर उठाई जाती रही.
यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि यह ज़रूरी है कि ये बताया जाए कि क्या हुआ था, इस क्षति की पूर्ति किस तरह से की जाए और इतिहास के इस दंश को आगे जारी रहने से कैसे रोका जाए.
यूएन मानवाधिकार उप उच्चायुक्त अवा डाबो ने कहा कि इन परीक्षणों का साया अब भी मार्शल आइलैंड्स के लोगों के शरीरों, ज़हरीली हो चुकी भूमि और विस्थापित समुदायों में देखा जा सकता है.
उन्होंने कहा कि जो लोग इन परीक्षणों की वजह से दूषण का शिकार हुए प्रवाल द्वीपों पर लौटने में असमर्थ हैं, उनके लिए न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
इन द्वीपों पर बार-बार परमाणु परीक्षण किए जाने के विनाशकारी स्वास्थ्य नतीजे भी हुए, जिसे इसी सप्ताह यूएन महासभा की एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान उठाया गया था.
मानवाधिकार उप उच्चायुक्त अवा डाबो के अनुसार मार्शल आइलैंड्स के लगभग हर परिवार, परमाणु परीक्षण के स्वास्थ्य दुष्प्रभावों की चपेट में आई है, जिसमें कैंसर की बढ़ी हुई दर भी है.
स्थानीय महिलाओं ने अचानक गर्भपात, मृत बच्चों के जन्म, और जन्मजात विकृतियों को झेला है.
यूएन की वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मार्शल आइलैंड्स के समुदायों के पास परमाणु परीक्षणों से हुए नुक़सान की भरपाई का अधिकार है.
इस विषय में, अमेरिकी प्रशासन से यह आग्रह किया गया है कि रेडिएशन की चपेट में आए समुदायों से जुड़े डेटा और परीक्षण सम्बन्धी रिकॉर्ड को साझा किया जाना होगा.