जलवायु में आ रहे बदलाव का स्वास्थ्य पर असर बढ़ रहा है और भीषण गर्मी, सूखे और अन्य आपदाओं के कारण होने वाली मौतों की संख्या में भी तेज़ी आ रही है. एक विश्लेषण के अनुसार, 2023 में अत्यधिक तापमान की वजह से विश्व भर में 7.10 लाख मौतें हुई और इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त गति से उपाय नहीं किए जा रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) व साझेदार संगठनों की यह रिपोर्ट लॉन्सेट जर्नल में प्रकाशित हुई है, जिसके अनुसार, पिछले एक दशक के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं में जलवायु परिवर्तन से उपजी आवश्यकताओं का ध्यान रखे जाने की दिशा में प्रगति हुई है. मगर, जलवायु कार्रवाई में और तेज़ी लाए जाने की ज़रूरत है.
युनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन की अगुवाई में तैयार इस विश्लेषण के लिए विश्व भर से शोधकर्ताओं और संस्थाओं ने अपना योगदान दिया है, जोकि जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य को जोड़ने वाले 54 संकेतकों पर आधारित है.
रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में पेरिस जलवायु समझौते के बाद के वर्षों में, उससे पहले के दशक की तुलना में, ताप लहरों के कारण होने वाली मौतों में 36 फ़ीसदी की वृद्धि हुई.
अध्ययन दर्शाता है कि चरम सूखे से प्रभावित क्षेत्र, 2006-2015 के दशक की तुलना में पिछले 10 वर्षों में 700 फ़ीसदी तेज़ी से बढ़ा है. 2025 में, पृथ्वी पर कुल भूमि क्षेत्र का 51.8 फ़ीसदी हिस्सा कम से कम एक महीने के लिए सूखे की चपेट में था.
इसके अलावा, जल सम्बन्धी अन्य प्राकृतिक आपदाओं जैसेकि बाढ़, तूफ़ान, अत्यधिक बारिश का ख़तरा बढ़ रहा है और भीषण गर्मी के कारण अर्थव्यवस्थाओं को नुक़सान हो रहा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में बढ़ते तापमान व वर्षा रुझानों और मच्छरों के काटने से होने वाली डेंगू बीमारी के फैलाव की पड़ताल की है.
Aedes albopictus नामक प्रजाति के मच्छरों के कारण होने वाली इस बीमारी के लिए अनुकूल परिस्थितियों में, 1981-90 और 2015-25 के दौरान 24 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. वहीं, Aedes aegypti प्रजाति के मच्छरों के लिए यह सात फ़ीसदी बढ़ी है.
जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य दुष्प्रभावों से निपटने के मोर्चे पर अहम प्रगति भी दर्ज की गई है. पिछले वर्ष, स्वच्छ ऊर्जा में 2,100 अरब डॉलर का वैश्विक निवेश किया गया.
जिन देशों में जीवाश्म ईंधन (तेल, गैस, कोयला) के कारण होने वाले वायु प्रदूषण में कमी आई है, वहाँ हजारों लोगों की असामयिक मौतों की रोकथाम में मदद मिली है.
इसके समानान्तर, जलवायु चुनौतियों का सामना करने में सहनसक्षम स्वास्थ्य प्रणालियों को विकसित किया जा रहा है, समय पूर्व चेतावनी सिस्टम बनाए गए हैं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुकूलन योजनाओं की दिशा में प्रयास हो रहे हैं.
हर चार में से एक देश में अब जलवायु परिवर्तन के अनुरूप, स्वास्थ्य सेवाओं को ढालने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाएँ हैं. 2015 में केवल 14 सदस्य देशों के पास यह प्रावधान था.
इसके बावजूद, विश्लेषण में आगाह किया गया है कि जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार को थामने के लिए प्रयास और अधिक गति से किए जाने होंगे.
दुनिया की 100 से अधिक तेल व गैस कम्पनियों द्वारा, 2040 तक, 150 प्रतिशत अधिक जीवाश्म ईंधन का उत्पादन करने का अनुमान है, जोकि पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए पर्याप्त नहीं है.
इसके मद्देनज़र, जलवायु परिवर्तन को एक वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में परिभाषित करने का आग्रह किया गया है. तुर्कीये के अन्ताल्या शहर में यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन (कॉप31) से पहले जारी इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य रक्षा पर केन्द्रित इन क़दमों पर बल दिया गया है: