अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के चार वरिष्ठ नेताओं के विरुद्ध गिरफ़्तारी के वॉरंट सार्वजनिक किए हैं. उन पर महिलाओं व लड़कियों के उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं, जिन्हें मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है.
इनमें तालेबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा, मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हाकिम हक़्क़ानी के अलावा हबीबुल्लाह आग़ा और नेदा मोहम्मद नदीम हैं. ये सभी चार वॉरंट पिछले वर्ष जुलाई और सितम्बर के दौरान जारी किए गए थे.
आईसीसी अभियोक्ता ने पहले दो वॉरंट के लिए 23 जनवरी 2025 को आवेदन किया था, जिसके बाद न्यायाधीशों ने 8 जुलाई को उन्हें जारी कर दिया था.
पीड़ितों व गवाहों की सुरक्षा के इरादे से पहले उन्हें गोपनीय रखा गया था, हालांकि कोर्ट ने यह जानकारी सार्वजनिक कर दी थी कि ऐसे वॉरंट जारी किए गए हैं.
आईसीसी के अनुसार, यह मानने का तार्किक आधार है कि ये चारों व्यक्ति उत्पीड़न का आदेश देने, उसके लिए उकसाने या ऐसा होने देने की कोशिश करने के लिए आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार हैं, जिसे रोम सम्विदा के अनुच्छेद 7 (1) (h) के तहत मानवता के विरुद्ध अपराध माना गया है.
अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की स्थापना, रोम सम्विदा (Rome Statute) के तहत की गई है.
वॉरंट के अनुसार, महिलाओं, लड़कियों व अन्य लोगों के विरुद्ध उत्पीड़न को लैंगिक आधार पर अंजाम दिया गया, जिसका वे लोग भी शिकार हुए, जिन्होंने लैंगिक पहचान या अभिव्यक्ति के विषय में तालेबान सरकार की नीति को नहीं माना.
कथित रूप से इन अपराधों को उन लोगों के विरुद्ध भी राजनैतिक आधार पर अंजाम दिया गया है, जिन्हें लड़कियों व महिलाओं के सहयोगी या समर्थक के रूप में देखा गया.
कोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में इन अपराधों को 15 अगस्त 2021 से 20 जनवरी 2025 की अवधि के दौरान अंजाम दिया गया. वर्ष 2021 में ही, तालेबान ने देश की सत्ता को अपने नियंत्रण में लिया था.
आईसीसी का कहना है कि तालेबान ने एक ऐसी नीति को लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ान आबादी के मूलभूत अधिकारों व स्वतंत्रताओं का गम्भीर उल्लंघन हुआ. इनकी वजह से हत्याओं, जेल बन्दी, यातना, बलात्कार और जबरन गुमशुदगी के मामले सामने आए.
तालेबान नेतृत्व के ये नियम हर किसी के लिए लागू किए गए थे, लेकिन लड़कियों व महिलाओं को विशेष रूप से उनकी लैंगिक पहचान की वजह से निशाना बनाया गया.
आधिकारिक आदेशों और फ़रमानों के ज़रिए, उन्हें शिक्षा, निजता, पारिवारिक जीवन, आवाजाही, अभिव्यक्ति, विचार और धर्म की आज़ादी से वंचित कर दिया गया.
अन्य अफ़ग़ान नागरिकों को भी इसलिए निशाना बनाया गया चूँकि यौनिकता (sexuality) और लैंगिक पहचान से जुड़े मामलों में उनकी अभिव्यक्ति, तालेबान की नीतियों के विरोध में थी. कोर्ट का मानना है कि इन नीतियों से सहमति नहीं रखने वाले लोगों के साथ राजनैतिक विरोधी के रूप में बर्ताव किया गया.