वैश्विक तापमान में वृद्धि का औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करना लगभग तय है. ऐसे में देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तत्काल बड़ी कटौती करनी होगी, ताकि तापमान वृद्धि को सीमित रखा जा सके और इस सदी के अन्त तक इसे फिर 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाया जा सके.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने बुधवार को जारी अपनी रिपोर्ट ‘उत्सर्जन अन्तराल रिपोर्ट 2026: वापसी का रास्ता’ में कहा है कि ठोस प्रयासों से इस सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान वृद्धि को अधिकतम 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सकता है.
इसके लिए 2025 की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत कटौती ज़रूरी होगी.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने रिपोर्ट के साथ जारी अपने सन्देश में कहा, “तापमान का 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करना हार मानने की वजह नहीं है. हम अब भी यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि तापमान इस सीमा से बहुत अधिक न बढ़े और लम्बे समय तक ऊपर न रहे. साथ ही, इस सदी के अन्त तक इसे फिर 1.5 डिग्री से नीचे लाया जा सकता है.”
रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु कार्रवाई तेज़ करने के अवसर पहले से कहीं अधिक हैं.
वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु समझौता अपनाए जाने के बाद नवीकरणीय ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार हुआ है. कोयले और तेल से ऊर्जा की आपूर्ति अनुमान से धीमी गति से बढ़ी है, जबकि जलवायु नीतियों से कई जगह उत्सर्जन घटा है.
UNEP की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐंडरसन ने निष्क्रियता के ख़तरों के प्रति आगाह किया.
उन्होंने कहा, “तापमान वृद्धि का 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर हर छोटा अंश और हर अतिरिक्त वर्ष, जलवायु जोखिम बढ़ाता है. इनमें विनाशकारी बाढ़, भीषण गर्मी और जंगलों में आग जैसी घटनाएँ शामिल हैं, जिनसे इस वर्ष कई देश प्रभावित हुए हैं.”
उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “हमें तापमान वृद्धि को कम से कम रखने और सदी के अन्त तक इसे फिर 1.5 डिग्री से नीचे लाने के लिए हरसम्भव प्रयास करने होंगे. यह अब भी सम्भव है.”
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा नीतियाँ जारी रहीं तो इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि 2.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकती है और आगे भी बढ़ सकती है.
पेरिस समझौते के तहत देशों को राष्ट्रीय जलवायु कार्ययोजनाएँ (NDCs) पेश करनी होती हैं. इन्हें पूरी तरह लागू करने और आगे भी ऐसे प्रयास जारी रखने पर तापमान वृद्धि 2.6 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रह सकती है.
ये अनुमान पिछले वर्ष से अधिक चिन्ताजनक हैं. इसकी वजह अमेरिका का पेरिस समझौते से हटना और पुराने उत्सर्जन आँकड़ों का संशोधित आकलन है.
पिछली रिपोर्ट के बाद पेश की गई नई जलवायु योजनाओं से भी कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा है.
हालाँकि, तापमान वृद्धि को फिर 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाना सम्भव है. जलवायु नीतियों से उत्सर्जन घटने के बढ़ते प्रमाण भी इसकी पुष्टि करते हैं.
रिपोर्ट में पहली वैश्विक समीक्षा (Global Stocktake (GST)) के दौरान तय किए गए लक्ष्यों पर तेज़ी से अमल करने का आहवान किया गया है. वर्ष 2021 से 2023 के बीच हुई इस समीक्षा में पेरिस समझौते के लक्ष्यों की दिशा में दुनिया भर के देशों की सामूहिक प्रगति का आकलन किया गया था.
हालाँकि, अधिकाँश लक्ष्यों पर प्रगति अब भी नाकाफ़ी है.
दूसरी वैश्विक समीक्षा अगले महीने तुर्की के अन्ताल्या में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (कॉप31) के दौरान शुरू होगी. इसमें उत्सर्जन घटाने के उपायों को प्राथमिकता देने और 2035 व 2040 के लिए स्पष्ट, ठोस लक्ष्य तय करने का अवसर मिलेगा.
रिपोर्ट में तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से कम से कम ऊपर जाने देने के लिए ज़रूरी लक्ष्य भी सुझाए गए हैं.
उदाहरण के लिए, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लक्ष्य के तहत, कुल ऊर्जा आपूर्ति में कोयले, तेल और गैस की हिस्सेदारी 2025 के मुक़ाबले 2035 तक क्रमशः कम से कम 55, 15 और 5 प्रतिशत घटानी होगी. साथ ही, वर्ष 2040 तक इनमें क्रमशः 75, 30 और 35 प्रतिशत की कटौती ज़रूरी होगी.