नेपाल में छह सप्ताह पहले अचानक आई भीषण बाढ़ की वजह से न केवल घर, पुल, सड़क व आजीविका तबाह हुई, बहुत से बच्चों का जीवन हमेशा के लिए बदल गया. बदलती जलवायु के दुष्प्रभावों और ऐसी अन्य आपदाओं के आने के साए में उन्हें अपने भविष्य के प्रति आशंका है और जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए समर्थन की आवश्यकता है.
26 अगस्त 2026 को नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सीमा पर एक ग्लेशियर के ध्वस्त हो जाने से अचानक, विशाल पैमाने पर बाढ़ आ गई थी जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान गई, और लगभग पाँच हज़ार लापता हो गए.
नेपाल के उत्तरी क्षेत्र में स्थित रसुवा, नुवाकोट और धादिंग क्षेत्रों में घरों, आजीविकाओं व सम्पत्तियों को नुक़सान पहुँचा. इस आपदा में कम से कम 84 बच्चों की मौत हुई है.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के प्रवक्ता जेम्स ऐल्डर ने शुक्रवार को नेपाल की राजधानी काठमाँडू से जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए 16 वर्षीय सहरा नामक युवती का ज़िक्र किया, जिससे उनकी हाल ही में मुलाक़ात हुई.
“उसकी माँ की बाढ़ में बह जाने की वजह से मौत हो गई. सहरा ने आँसू भरी आँखों में बताया कि एक माँ के बग़ैर जीना बिलकुल भी सही नहीं है.”
नेपाल में बाढ़ प्रभावित नगर और गाँव अब युद्धभूमि जैसे नज़र आते हैं और बुनियादी ढाँचों को हुए नुक़सान की वजह से अनेक प्रभावित समुदायों के लिए मदद पहुँचा पाना कठिन है. इसलिए, अलग-थलग हो गए इलाक़ों में विमान के ज़रिए राहत सामान की आपूर्ति की जा रही है.
सर्वाधिक प्रभावित इलाक़ों में परिवारों को बाज़ार में उथलपुथल, आवाजाही की ऊँची परिवहन लागत और अति-आवश्यक सामान की क़िल्लत से जूझना पड़ रहा है. सड़कों व संचार व्यवस्था को धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है. लेकिन अब भी बड़ी संख्या में बच्चे और परिवार ज़रूरतमन्द हैं.
सुशीला और उनके पति जीवन को मदद की तत्काल आवश्यकता है. दो मीटर ऊँची लहरों के साथ बाढ़ का उफ़नता पानी उनके घरों तक आ पहुँचा था, जिसे उनकी दर्जी व चाय की दुकान बर्बाद हो गई.
वे दोनों खाली हाथ अपनी जान बचाने के लिए भाग गए. सुशीला ने बाद में जेम्स ऐल्डर को बताया कि शायद अच्छा होता यदि वे भाग निकलने में कामयाब नहीं हो पाते.
यूनीसेफ़ द्वारा इस परिवार को नक़दी सहायता प्रदान की गई है और अब उन्हें अपनी व बच्चों की प्राथमिकताओं के लिए ख़र्च करना है: किताबें, पढ़ने लिखने का सामान और कपड़े.
उन्होंने कहा कि “यह एक ऐसा दबाव और सदमा है जोकि विश्व में अन्य स्थानों पर अकर्मण्यता की वजह से पनपता है.”
जेम्स ऐल्डर के अनुसार, नेपाल समेत जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से अन्य सम्वेदनशील देशों के लिए अन्तरराष्ट्रीय समर्थन ज़रूरी है, चूँकि हिमालय क्षेत्र में तापमान बढ़ने की दर, वैश्विक औसत की तुलना में दो गुनी है.
यूनीसेफ़ प्रवक्ता ने ध्यान दिलाया कि नेपाल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 0.1 प्रतिशत हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है, मगर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों में है.
उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन पर यूएन फ़्रेमवर्क सन्धि में देशों ने जलवायु हानि व क्षति को कम करने का संकल्प लिया है, लेकिन नेपाल जैसे देशों के लिए इन प्रतिबद्धताओं को तुरन्त कार्रवाई में बदला जाना होगा, ताकि प्रभावित परिवारों तक पहुँचा जा सके.
“जब तक दुनिया जलवायु जोखिमों में कमी लाने के लिए क़दम नहीं उठाएगी, हम अगली बाढ़ और अगले भूस्खलन के बाद उन्हीं घाटियों में लौटते रहेंगे, और बच्चे इसकी सबसे ऊँची क़ीमत चुकाते रहेंगे.”