जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों में सबसे स्पष्ट नज़र आने वाला प्रभाव है, समुद्री जलस्तर का बढ़ना. कुछ देशों के लिए यह उनके अस्तित्व का संकट भी बन गया है. इस विशाल संकट से निपटने के संकल्प से, विश्व नेता गुरूवार को एक उच्चस्तरीय बैठक में शिरकत कर रहे हैं, जिसमें एक नए घोषणापत्र को पारित किया जाएगा, अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को मज़बूती देने के सर्वोत्तम उपायों की तलाश होगी और निचले तटीय इलाक़े वाले देशों को समर्थन देने के समाधानों पर भी.
बढ़ते समुद्री जलस्तर के मुद्दे पर यह बैठक, यूएन महासभा के 81वें सत्र के दौरान बुलाई गई है, जोकि देशों के अस्तित्व पर मंडराते ख़तरों का मुक़ाबला करने पर केन्द्रित है.
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वर्ष 2024 में वैश्विक समुद्री जलस्तर में 6 मिलिमीटर की वृद्धि दर्ज की गई, जोकि अब तक की सबसे अधिक वार्षिक मात्रा है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैस हमारी पृथ्वी को गर्मा रही हैं, महासागर पर दबाव बढ़ रहा है और वे 90 फ़ीसदी तक इस ताप को सोखने के लिए मजबूर हैं.
महासचिव गुटेरेश ने ज़ोर देकर कहा कि यदि उत्सर्जन में विशाल कटौती नहीं की गई तो समुद्री जलस्तर में वृद्धि एक मीटर तक पहुँच सकती है.
ठोस अनुकूलन और कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए उपायों के अभाव में, इस सदी के अन्त तक तटीय शहरों और समुदायों के लिए जोखिम 10 गुना तक बढ़ जाएगा, जिससे अर्थव्यवस्था, व्यापार, बुनियादी ढाँचे और खाद्य प्रणाली के लिए संकट बढ़ेगा.
सांस्कृतिक विरासत, पहचान मिटने की आशंका बढ़ेगी, अस्थिरता गहराएगी, कुछ राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता को ठेस पहुँच सकती है और पूरी आबादी विस्थापन के लिए मजबूर.
यूएन प्रमुख ने कहा कि समुद्री जलस्तर की समस्या से निपटने के लिए पहले उपाय के तहत, इसकी बुनियादी वजहों से निपटना होगा. पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि को कम अवधि तक ही सीमित रखना होगा.
वैश्विक उत्सर्जन में 2035 तक 60 प्रतिशत तक की कमी लानी होगी. नवीकरणीय ऊर्जा में तीन गुना वृद्धि, ऊर्जा दक्षता में दोगुनी बढ़ोत्तरी, मीथेन उत्सर्जन में कटौती, वनों की कटाई पर रोक, और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में कमी भी आवश्यक है.
दूसरा, बढ़ते जलस्तर से आम लोगों की रक्षा की जानी होगी, जिसके लिए राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं को सहनसक्षम बनाना होगा और वित्तीय संसाधनों का प्रबन्ध करना होगा. हर एक व्यक्ति को समय पूर्व चेतावनी प्रणाली के दायरे में लाना होगा.
तीसरा, क़ानूनी ख़ामियों को पाटना होगा. केवल घर खो जाने से, लोगों के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते हैं, और सरकारों को व्यक्तियों व समुदायों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी. यूएन प्रमुख के अनुसार, इस विषय में क़ानूनी स्पष्टता की आवश्यकता है और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी है ताकि उन तंत्रों को तैयार किया जा सके, प्रभावित देश व समुदाय जिनके हक़दार हैं.