दुनिया ने नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव से निपटने की दिशा में अभी तक कितनी प्रगति हासिल की है और यह सफ़र अभी कितना बाक़ी है? वर्ष 2001 में दक्षिण अफ़्रीका के डरबन शहर में नस्लवाद के विरोध में एक घोषणापत्र पारित किया गया था, जिसकी 25वीं वर्षगाँठ के सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सोमवार को हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान इन चुनौतियों पर पार पाने के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता व्यक्त की गई.
'डरबन घोषणापत्र और कार्रवाई कार्यक्रम' को नस्लवाद से मुक़ाबले में, अब तक का सबसे व्यापक फ़्रेमवर्क माना गया है, जोकि ऐतिहासिक अन्यायों को स्वीकारने, असमानताओं को दूर करने, और नस्लीय भेदभाव से रक्षा करने पर केन्द्रित है.
इस घोषणापत्र में, हर एक व्यक्ति के लिए गरिमा, समानता व न्याय की बुनियाद पर समाजों का निर्माण करने का लक्ष्य रखा गया है.
यह मानवाधिकारों के लिए सम्मान सुनिश्चित करने का एक ब्लूप्रिन्ट माना गया है, जिसके तहत नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशों के प्रति नापसन्दगी व डर, और बढ़ती असहिष्णुता का सामना करने के लिए निम्न उपाय सुझाए गए हैं:
डरबन घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, मगर यह अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के ठोस संकल्प व मज़बूत नैतिक मूल्यों को दर्शाता है, और विश्व भर में पैरोकारी (advocacy) प्रयासों का आधार है.
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने डरबन घोषणापत्र की 25वीं वर्षगाँठ के सिलसिले में न्यूयॉर्क में आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि नस्लवाद के विरुद्ध लड़ाई में मज़बूत क़ानूनों, समावेशी संस्थाओं और क्षतिपूर्ति के लिए न्यायिक उपायों की आवश्यकता है.
उन्होंने नस्लवाद को एक ऐसा विष क़रार दिया, जिसकी बुनियाद दासता और औपनिवेशवाद में है और जिसके असर अब भी महसूस किए जाते हैं.
यूएन प्रमुख ने कहा कि अफ़्रीकी मूल के व्यक्तियों के साथ-साथ आदिवासी जन, प्रवासियों, शरणार्थियों व अल्पसंख्यकों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
“नस्लवाद समाजों में विष घोल रहा है, असमानताओं को गहरा कर रहा है और लोगों के लिए उनके बुनियादी अधिकारों व स्वतंत्रताओं को नकार रहा है.” उनके अनुसार, नस्लवाद के अनेक रूप हो सकते हैं: आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक असमानताओं से लेकर, भेदभावपूर्ण क़ानूनों, नीतियों व संस्थाओं तक.
महासचिव गुटेरेश ने आगाह किया कि नई टैक्नॉलॉजी और डिजिटल माध्यमों की वजह से नफ़रत भरे भाषण व सन्देश, भ्रामक जानकारी तेज़ी से फैल रही हैं, झूठ व हानिकारक रूढ़िवादी धारणाओं को बल मिल रहा है और हिंसा व दुर्व्यवहार को ईंधन.
यूएन प्रमुख ने कहा कि इस विष का मुक़ाबला, पारस्परिक एकता और ठोस कार्रवाई के ज़रिए किया जाना होगा.
उन्होंने देशों की सरकारों से भेदभाव के विरोध व समानता के समर्थन में क़ानूनों को मज़बूती देने का आग्रह किया. इसकी अगुवाई सरकारों को करनी होगी, लेकिन उनके अनुसार, इस प्रक्रिया में हर किसी की एक भूमिका है.
व्यवसायों को प्रत्यक्ष व परोक्ष भेदभाव की रोकथाम करनी होगी और कार्यस्थलों में ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे सके.
उन्होंने बताया कि युवा पीढ़ियाँ, गरिमा, न्याय व समानता की भावना को कक्षाओं, समुदायों, कार्यस्थलों, टैक्नॉलॉजी प्रयोगशालाओं और डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म तक पहुँचाने में जुटी हैं, जहाँ भविष्य को आकार दिया जाता है.
महासचिव ने ‘अफ़्रीकी मूल के व्यक्तियों के लिए दूसरे अन्तरराष्ट्रीय दशक’ (दिसम्बर 2024 में आरम्भ) के दौरान ठोस उपायों को अपनाने और नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अन्तरराष्ट्रीय सन्धि को पूरी तरह से अमल में लाने का आग्रह किया है.