पेरिस समझौते में तय 1.5 डिग्री सेल्सियस की तापमान सीमा का कुछ समय के लिए पार होना अब लगभग तय माना जा रहा है. चुनौती यह है कि यह बढ़ोत्तरी कम से कम हो और ज़्यादा समय तक न रहे. इसे सम्भव बनाने के लिए उत्सर्जन में तेज़ कटौती, अधिक वित्तीय संसाधन और मज़बूत अन्तरराष्ट्रीय सहयोग अहम होंगे.
लगभग एक दशक पहले दुनिया 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही थी. पेरिस समझौते के बाद हुई जलवायु कार्रवाई से यह अनुमान घटकर 2.3 डिग्री सेल्सियस रह गया है, बशर्ते देश अपनी मौजूदा प्रतिबद्धताएँ पूरी तरह लागू करें.
संयुक्त राष्ट्र इन प्रयासों के केन्द्र में रहा है और देशों से मज़बूत जलवायु योजनाएँ, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ बदलाव तथा अनुकूलन, जलवायु न्याय और विकासशील देशों की वित्तीय ज़रूरतों पर अधिक ध्यान देने का आग्रह करता रहा है.
फिर भी जलवायु संकट गहराया है. पिछले 11 वर्ष अब तक के सबसे गर्म रहे हैं और भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़, तूफ़ान व जंगल की आग से लोगों, अर्थव्यवस्थाओं व विकास पर असर बढ़ा है.
दुनिया अब भी अस्थाई रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने की ओर बढ़ रही है.
ऐसे में, चुनौती नए वादों की नहीं, बल्कि मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और कार्रवाई तेज़ करने की है.
1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा, औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में दशकों के औसत वैश्विक तापमान को दर्शाती है. किसी एक असाधारण रूप से गर्म वर्ष से यह तय नहीं होती.
सीमा पार होने का अर्थ है कि वैश्विक तापमान कुछ समय के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए, चरम पर पहुँचे और उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती होने पर फिर नीचे आने लगे.
लेकिन तापमान का घटना तय नहीं है. यह सरकारों द्वारा अभी और आने वाले वर्षों में लिए जाने वाले फ़ैसलों पर निर्भर करेगा.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देशों की मौजूदा जलवायु योजनाएँ और अतिरिक्त नैट-ज़ीरो प्रतिबद्धताएँ पूरी तरह लागू होने पर भी तापमान वृद्धि लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकती है.
यह अन्तर छोटा लग सकता है, लेकिन इसके मायने बड़े हैं. तापमान जितना अधिक बढ़ेगा और जितने लम्बे समय तक ऊँचा रहेगा, जोखिम उतने ही बढ़ेंगे.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने चेतावनी दी है, “तापमान में हर अंश की बढ़ोत्तरी से मौतें बढ़ेंगी, आजीविकाएँ तबाह होंगी, असमानता गहराएगी और पारिस्थितिकी तंत्र अपरिवर्तनीय क्षति के और क़रीब पहुँचेंगे.”
तेज़ कार्रवाई अब इसलिए और ज़रूरी है क्योंकि मौजूदा योजनाएँ, जलवायु संकट से निपटने के लिए विज्ञान की माँग से बहुत पीछे हैं.
वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 90 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार देशों ने अपनी राष्ट्रीय जलवायु योजनाएँ, यानि NDCs अपडेट कर दी हैं. लेकिन इन्हें पूरी तरह लागू करने पर भी 2035 तक उत्सर्जन में केवल लगभग 10 प्रतिशत कमी आने की उम्मीद है.
1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करने की सम्भावना बनाए रखने के लिए, 2035 तक उत्सर्जन में लगभग 60 प्रतिशत कटौती करनी होगी.
इस अन्तर को पाटने के लिए मीथेन और अन्य अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों में तेज़ कटौती, वनों की कटाई पर रोक तथा जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ बदलाव ज़रूरी है.
इसके साथ ही आधुनिक बिजली ग्रिड, अधिक ऊर्जा भंडारण और परिवहन, तापन प्रणालियों व उद्योग में स्वच्छ बिजली का इस्तेमाल बढ़ाना होगा.
तेज़ बदलाव से ऊर्जा सुरक्षा भी मज़बूत हो सकती है. दुनिया में हर चार में से तीन लोग ऐसे देशों में रहते हैं, जो अपनी ज़रूरत के लिए जीवाश्म ईंधन के आयात पर अधिक निर्भर हैं. युद्ध या आपूर्ति में रुकावट के समय इससे क़ीमतें बढ़ने और ऊर्जा संकट का ख़तरा बढ़ जाता है. नवीकरणीय ऊर्जा इस निर्भरता को कम कर सकती है.
जैसेकि महासचिव एंतोनियो गुटेरेश कहते हैं, “धूप पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता और हवा की क़ीमत में कोई उछाल नहीं आता.”
स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए सभी देशों के पास समान आर्थिक संसाधन नहीं हैं.
विकासशील देशों को नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए अक्सर महँगा ऋण मिलता है. इससे बड़ी सम्भावनाओं के बावजूद स्वच्छ ऊर्जा, बिजली ग्रिड और ऊर्जा भंडारण में निवेश मुश्किल हो जाता है.
संयुक्त राष्ट्र कम लागत पर धन उपलब्ध कराने, बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार और विकासशील देशों में अधिक निजी निवेश का आहवान करता रहा है.
धन की उपलब्धता यह भी तय करती है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव का फ़ायदा किन लोगों और देशों तक पहुँचेगा. न्यायसंगत बदलाव के लिए कामगारों एवं समुदायों को बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढलने में मदद, सम्मानजनक रोज़गार के अवसर और विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए.
बैटरियों और अन्य तकनीकों के लिए ज़रूरी खनिजों का उत्पादन करने वाले देशों को केवल कच्चा माल निर्यात करने के बजाय, उससे होने वाले आर्थिक लाभ में भी बड़ी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.
उत्सर्जन में कटौती भविष्य की तापमान वृद्धि को सीमित कर सकती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के मौजूदा प्रभावों को नहीं मिटा सकती.
नेपाल और चीन में हाल की बाढ़ व भूस्खलन ने दिखाया है कि समुदाय और बुनियादी ढाँचे चरम मौसम के प्रति कितने संवेदनशील हैं. 2027 की शुरुआत तक बने रहने की सम्भावना वाला मज़बूत अल-नीनो, अफ़्रीका के ग्रेटर हॉर्न और लातिन अमेरिका व कैरेबियाई क्षेत्र के कई हिस्सों में जोखिम और बढ़ा सकता है.
इसीलिए अनुकूलन ज़रूरी है – यानि उन जलवायु प्रभावों से निपटने की तैयारी, जिन्हें अब टाला नहीं जा सकता.
इसमें मज़बूत बुनियादी ढाँचा, सहनसक्षम कृषि व पारिस्थितिकी तंत्र, बेहतर जल प्रबन्धन और समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियाँ शामिल हैं, ताकि समुदाय बाढ़, सूखा, तूफ़ान एवं तापलहरों के लिए बेहतर तैयार हो सकें.
इसके लिए अधिक वित्तीय सहायता भी ज़रूरी है, विशेषकर उन देशों एवं समुदायों के लिए जो जलवायु प्रभावों और हानि व क्षति का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं.
कोई भी देश अकेले जलवायु परिवर्तन से नहीं निपट सकता.
सरकारें अपनी जलवायु नीतियाँ खुद तय करती हैं, लेकिन उन्हें लागू करने वाली ऊर्जा, वित्त, तकनीक और आपूर्ति श्रृँखलाओं की व्यवस्थाएँ एक देश तक सीमित नहीं होतीं – वे कई देशों और सीमाओं के पार जुड़ी होती हैं. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी राष्ट्रीय सीमाओं पर नहीं रुकता.
अन्तरराष्ट्रीय सहयोग से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव तेज़ करने, जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने और वित्त तक पहुँच आसान बनाने में मदद मिल सकती है.
हालाँकि सभी देशों की स्थिति समान नहीं है. कुछ के पास अधिक संसाधन और क्षमता हैं, जबकि अन्य को बड़ी वित्तीय और तकनीकी बाधाओं का सामना करना पड़ता है.
चुनौती यह है कि इन बाधाओं को कम किया जाए और ज़्यादा देशों को तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद मिले, ख़ासतौर पर ऐसे समय में जब भू-राजनैतिक तनाव अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को मुश्किल बना रहे हैं.
यही प्राथमिकताएँ 23 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होने वाले महासचिव के जलवायु शिखर सम्मेलन के केन्द्र में रहेंगी. सम्मेलन के तीन मुख्य लक्ष्य हैं: बदलाव की रफ़्तार बढ़ाना, धन जुटाना और लोगों की रक्षा करना.
सम्मेलन में सरकारों, विकास बैंकों, व्यवसाय जगत, वित्तीय क्षेत्र और नागरिक समाज के प्रतिनिधि जलवायु प्रतिबद्धताओं को अमल में लाने की व्यावहारिक चुनौतियों पर चर्चा करेंगे.
पूरे सप्ताह ‘समाधान संवाद’ भी आयोजित होंगे, जिनमें ऊर्जा, महासागर, अनुकूलन, मीथेन, वित्त, सूचना की विश्वसनीयता और हरित औद्योगिकीकरण जैसे क्षेत्रों में कार्रवाई तेज़ करने के तरीक़ों पर चर्चा होगी.
मुख्य ज़ोर मौजूदा प्रतिबद्धताओं को ठोस कार्रवाई में बदलने और अमल तेज़ करने पर होगा.
जलवायु शिखर सम्मेलन का प्रसारण UNWebTV पर देखा जा सकेगा.
सम्मेलन से जुड़ी अधिक जानकारी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है.