नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने कहा कि उनकी इच्छा थी कि वह यूएन जनरल असेम्बली को विकास, लोकतंत्र, शान्ति और एक युवा राष्ट्र की आकाँक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर सम्बोधित करें. मगर, उन्हें अपने देश में बाढ़ की वजह से विशाल स्तर पर हुई मौतों व विध्वंस के बारे में बात करनी होगी.
उन्होंने गुरूवार को महासभा के 81वें सत्र में जनरल डिबेट के दौरान कहा कि नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र में अगस्त महीने में अचानक आई विनाशकारी बाढ़, केवल एक स्थानीय त्रासदी नहीं है, बल्कि विश्व के लिए एक चेतावनी है.
इसकी वजह से, नेपाल और चीन की सीमा के दोनों ओर, बड़े पैमाने पर तबाही हुई है.
“जलवायु परिवर्तन सीमाओं की पहचान नहीं करता है. ग्लेशियर और बाढ़, अपने पासपोर्ट पर मुहर के साथ यात्रा नहीं करते हैं.”
नेपाल के नेता ने कहा कि मगर इसके बावजूद, विश्व नेताओं ने जलवायु संकट की इन चेतावनियों को ज़रूरी स्तर व तेज़ी से कार्रवाई में तब्दील करने के प्रति उपेक्षा दर्शाई है.
प्रधानमंत्री शाह के अनुसार, नेपाल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान करता है, और जलवायु संकट के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
“और फिर भी, हम इसके लिए एक विशाल क़ीमत चुका रहे हैं. हमारे ग्लेशियर खिसक रहे हैं. हमारी पर्वतीय ढलानें अस्थिर होती जा रही हैं. हमारी नदियों के बारे में अनुमान लगा पाना कठिन होता जा रहा है.”
नेपाल के लिए जलवायु विनाश, केवल एक मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास के लिए आपात स्थिति भी है, जिसने वर्षों की प्रगति को धूमिल कर दिया है.
उन्होंने इस विशाल चुनौती पर पार पाने के लिए हर किसी से अपने साझा दायित्व का निर्वहन करने और एकजुटता दर्शाने का आग्रह किया. साथ ही, ऐतिहासिक दृष्टि से जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िन देशों की ज़िम्मेदारी बनती है, उनसे अधिक क्षमता के साथ क़दम उठाने की अपील की.
“जलवायु न्याय, संयुक्त राष्ट्र के किसी दस्तावेज़ में एक सुन्दर वाक्यांश तक सीमित नहीं रह सकता है.” नेपाल की जनता को अपने भविष्य को आकार देने की अनुमति देनी होगी, और निरन्तर केवल अतीत का ही पुनर्निर्माण करने को टालना होगा.
नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा कि हिमालय क्षेत्र, हमारी पृथ्वी के लिए जीवन-समर्थन प्रणाली है. इसलिए, उन्होंने तत्काल हिमालय जलवायु सहनसक्षम तंत्र को स्थापित किए जाने का प्रस्ताव दिया, जिसकी अगुवाई नेपाल, भारत व चीन द्वारा की जाए. यह डेटा, विशेषज्ञता, सहायता व आवश्यक होने पर प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई पर लक्षित होगा.
उन्होंने कहा कि जलवायु न्याय केवल धनराशि से जुड़ा मसला नहीं है. यह इस बारे में भी है कि क़ीमत को कौन चुकाए, न्याय प्रक्रिया में किसकी आवाज़ को शामिल किया जाए, और समय पूर्व तैयारी की संस्कृति को विकसित किया जाए.