बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने कहा है कि पिछले 9 वर्षों के दौरान, उनके देश ने म्याँमार से भागकर आए 12 लाख से अधिक रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण दी हुई है, मगर इससे घरेलू संसाधनों, पर्यावरण, सुरक्षा और स्थानीय समुदायों पर अपार दबाव है.
उन्होंने गुरूवार को यूएन महासभा के 81वें सत्र के दौरान जनरल डिबेट में अपने सम्बोधन में कहा कि मानव इतिहास में प्रवासन प्रक्रिया से विश्व भर में समुदायों को लाभ पहुँचा है, लेकिन रोहिंग्या संकट बांग्लादेश के लिए एक बड़ी चुनौती है.
इसके मद्देनज़र, बांग्लादेश के नेता ने प्रवासियों के अधिकारों, गरिमा और कल्याण को सुनिश्चित करने के इरादे से वैश्विक सहयोग का आग्रह किया. उन्होंने विस्थापित रोहिंग्या लोगों के लिए अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से जीवनरक्षक सहायता कार्यक्रम जारी रखने की भी अपील की है, जब उनकी अपने घरों तक सुरक्षित व गरिमामय वापसी नहीं हो जाती है.
“एक घनी आबादी वाले देश के तौर पर, बांग्लादेश का मानना है कि रोहिंग्या संकट की बुनियादी वजह व स्रोत, म्याँमार में है. इसलिए इसका समाधान भी वहीं है.”
“इस समस्या का एकमात्र समाधान, विस्थापित रोहिंग्या लोगों की म्याँमार में उनकी गृहभूमि में जल्द, सुरक्षित वापसी है.” प्रधानमंत्री रहमान ने चेतावनी दी है कि यदि इसमें विफलता हाथ लगी तो भविष्य में एक मानवतावादी संकट खड़ा हो जाएगा.
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में 15 वर्षों से अधिक समय तक जारी रहे फ़ासीवादी शासन व शोषण का अन्त हुआ है और देश फ़ासीवाद से 2024 में आज़ाद होने के बाद फिर से लोकतंत्र के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है.
प्रधानमंत्री के अनुसार, पुनर्बहाली व पुनर्निर्माण प्रक्रिया के दौरान, बांग्लादेश के लिए अवसरों का एक विशाल क्षितिज खुला है.
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) के इस युग में विज्ञान व टैक्नॉलॉजी दुनिया को एक नया आकार दे रहे हैं और इसलिए यह ज़रूरी है कि डिजिटल जगत में व्याप्त मौजूदा खाई, भविष्य में एआई क्षेत्र में दूरियों की वजह न बन जाए.
प्रधानमंत्री रहमान ने संयुक्त राष्ट्र से एक कारगर नीतिगत फ़्रेमवर्क पारित करने की अपील की है, ताकि इन टैक्नॉलॉजी के विकास और त्वरित विस्तार का लाभ सभी देशों तक पहुँच सके.