कैरीबियाई क्षेत्र से लेकर प्रशान्त तक, लघु द्वीपीय देशों के नेताओं ने शुक्रवार को यूएन महासभा के 81वें सत्र के दौरान जनरल डिबेट में जलवायु न्याय, महासागर संरक्षण, और पहले से अधिक एकजुट प्रयासों की पुकार लगाई. उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ता समुद्री जलस्तर, राष्ट्रीय सीमाओं को नए सिरे से तय कर रहा है, जबकि दूरदराज के क्षेत्रों में जारी युद्धों का असर उनके तटों तक भी महसूस किया जा रहा है. यूएन महासभा के वार्षिक आयोजन के चौथे दिन हुए सम्बोधनों पर एक नज़र…
यह क्यों मायने रखता है: लघु द्वीपीय देशों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन अब को दूर नज़र आने वाला ख़तरा नहीं है. इससे अर्थव्यवस्थाओं को क्षति पहुँच रही है, जल व खाद्य सुरक्षा पर गम्भीर असर हो रहा है और समुदायों के लिए जोखिम बढ़ रहे हैं.
चुनौतियाँ बड़ी हैं: इन देशों के नेताओं का तर्क है कि अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र में उन जोखिमों का ध्यान नहीं रखा गया है जिनसे लघु द्वीपीय विकासशील देश जूझ रहे हैं.
क्या कहा गया: द्वीपीय व तटीय देशों के लिए, महासागर उनकी पहचान, सुरक्षा व आर्थिक अस्तित्व की बुनियाद में है.
जल ही जीवन है: जनरल डिबेट के दौरान जल की क़िल्लत और देशों की सीमाओं के परे तक जल संसाधन की देखरेख व्यवस्था भी एक अहम सुरक्षा मुद्दे के रूप में उभरा.