घरेलू कामगार, घरों में साफ़-सफ़ाई, खाना पकाने, बच्चों, बुज़ुर्गों व विकलांगजन की देखभाल समेत कई बड़ी ज़िम्मेदारियाँ सम्भालते हैं लेकिन फिर भी उनके योगदान को कम करके आंका जाता है. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के एक विश्लेषण के अनुसार, दुनिया भर में पिछले साल लगभग 6.65 करोड़ घरेलू कर्मचारी अनौपचारिक रूप से काम कर रहे थे और हर पाँच में से चार से अधिक घरेलू श्रमिक रोज़गार सम्बन्धी अधिकारों से वंचित हैं.
अनौपचारिक रूप से रोज़गार होने की वजह से अक्सर कामगारों के पास लिखित अनुबन्ध नहीं होता है, जिसमें कामकाजी घंटे, अवकाश या श्रम क़ानून के तहत न्यूनतम वेतन को स्पष्ट किया गया हो. न ही वे सामाजिक सुरक्षा, जैसेकि पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या अन्य सुविधाओं के दायरे में आ पाते हैं.
यूएन श्रम एजेंसी की निदेशक सहरा रज़ावी ने कहा कि घरेलू श्रमिक लाखों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी आसान बनाते हैं, लेकिन अक्सर स्वयं ही शोषण का शिकार होते हैं.
"ये श्रमिक हमारे घरों की सफ़ाई करते हैं, खाना बनाते हैं, बच्चों, बुज़ुर्गों और विकलांग व्यक्तियों की देखभाल करते हैं. फिर भी, इनके योगदान को अक्सर नज़रअन्दाज़ किया जाता है और इनके काम को उचित अहमियत या पहचान नहीं मिलती."
अन्य कर्मचारियों की तुलना में उनके श्रम अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा, जैसेकि स्वास्थ्य बीमा, पेंशन एवं सवेतन छुट्टियाँ पाने के अधिकार से वंचित रहने की आशंका दोगुने से भी अधिक रहती है. उन्हें अक्सर बेहद कम वेतन पर समय-बेसमय और लम्बे समय तक काम करना पड़ता है, जिससे शोषण का ख़तरा बढ़ता है.
वर्ष 2019 में दुनिया भर में घरेलू श्रमिकों की संख्या 7.56 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई. हालाँकि, कुल रोज़गार में इनकी हिस्सेदारी लगभग 2.2 प्रतिशत पर स्थिर रही.
दुनिया के लगभग आधे घरेलू श्रमिक एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में काम करते हैं. वहीं, 2019 के बाद से अफ़्रीका में इनकी संख्या सबसे अधिक बढ़ी है, जहाँ 42 लाख नए श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े.
अफ़्रीका में 93.3 प्रतिशत घरेलू श्रमिक अनौपचारिक रूप से काम करते हैं, यानि उन्हें रोज़गार से जुड़ी सुरक्षा और सुविधाएँ नहीं मिल पातीं. ILO के अनुसार, अरब देशों में लगभग सभी घरेलू श्रमिकों की यही स्थिति है.
योरोप और मध्य एशिया में अनौपचारिक रोज़गार की दर सबसे कम है. फिर भी, वहाँ हर तीन में से एक से अधिक घरेलू श्रमिकों को बिना औपचारिक व्यवस्था के वेतन मिलता है. ऐसे वेतन का सरकारी रिकॉर्ड में हिसाब नहीं होता और उस पर आयकर भी नहीं चुकाया जाता.
ILO ने इस क्षेत्र में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी की ओर भी ध्यान दिलाया है. विश्व भर के घरेलू श्रमिकों में 77.2 प्रतिशत महिलाएँ हैं, जो मुख्य रूप से साफ़-सफ़ाई और देखभाल का काम करती हैं.
घरेलू श्रमिकों की औसत मासिक कमाई अन्य कर्मचारियों के वेतन का महज़ 53.3 प्रतिशत है. अनौपचारिक रूप से काम करने वालों के लिए यह आँकड़ा और भी कम, 48.7 प्रतिशत है. वर्ष 2019 के बाद से वेतन का यह अन्तर लगातार बढ़ रहा है.
घरेलू श्रमिकों को अक्सर लम्बे समय तक काम भी करना पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार, एक-तिहाई से अधिक घरेलू श्रमिक सप्ताह में कम से कम 49 घंटे काम करते हैं, जबकि लगभग 15 प्रतिशत को 60 घंटे या उससे भी अधिक काम करना पड़ता है.
दूसरी ओर, अन्य कर्मचारियों की तुलना में घरेलू श्रमिकों को कम घंटों का काम और कम वेतन मिलने की आशंका भी अधिक रहती है. पर्याप्त काम न मिलने के कारण उन्हें गुज़ारा करने के लिए कई अलग-अलग घरों में काम करना पड़ता है.
इन चिन्ताजनक आँकड़ों के बीच कुछ सुधार भी हुए हैं. बड़ी संख्या में ऐसे देश हैं, जहाँ 2019 के बाद से अनौपचारिक रूप से काम करने वाले घरेलू श्रमिकों की हिस्सेदारी घटी है.
इसके अलावा, 40 देशों ने ILO कन्वेंशन संख्या 189 को औपचारिक रूप से अपनाया है. यह अन्तरराष्ट्रीय समझौता घरेलू श्रमिकों के लिए उचित वेतन, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और अधिकारों की सुरक्षा के मानक तय करता है.
हालाँकि, यूएन श्रम एजेंसी ने और अधिक संख्या में देशों से इस समझौते को अपनाने और इसके मानक लागू करने की अपील की है, विशेष रूप से एशियाई और अरब देशों में इसकी ज़रूरत बताई गई है, जहाँ इसे अपनाने वाले देशों की संख्या बेहद कम है.
श्रम संगठन के मूल सिद्धान्त पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा, "घरेलू काम भी अन्य कामों की तरह काम है और घरेलू श्रमिक भी बाक़ी श्रमिकों के समान अधिकार और सुरक्षा के हक़दार हैं."