‘ग्लोबल साउथ’ के देश न केवल स्वयं विकास पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि नवाचारी उपायों और विकास चुनौतियों से निपटने के लिए समाधानों को भी मुहैया करा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुरूवार को 'भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष' के 9वें वार्षिक कार्यक्रम में कहा कि बढ़ते संकटों के दौर में यह पहल, पारस्परिक एकजुटता की भावना को दर्शाती है.
संयुक्त राष्ट्र और भारत द्वारा स्थापित विकास साझेदारी कोष के माध्यम से अफ़्रीका, एशिया, लातिन अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र में स्थित विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) में सतत विकास परियोजनाओं को समर्थन दिया जाता है.
भारत-यूएन कोष, 'दक्षिण-दक्षिण सहयोग' की भावना के अन्तर्गत वर्ष 2017 में, 15 करोड़ डॉलर के संकल्प के साथ शुरू किया गया था.
ये विकास परियोजनाएँ, भारत सरकार के समर्थन और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के सहयोग से लागू की जाती हैं, जिसमें सबसे कम विकसित देशों और लघु द्वीपीय देशों पर प्रमुखता से ध्यान केन्द्रित किया जाता है.
कुछ परियोजनाओं पर एक नज़र:
दक्षिण-दक्षिण सहयोग से तात्पर्य, विकासशील देशों के बीच विकास साझेदारी से है, जिसमें ये देश आपसी सम्मान व लाभ के सिद्धान्त पर आधारित, साझा विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करते हैं.
एक अनुमान के अनुसार, 'ग्लोबल साउथ' में लगभग 134 देश हैं, जहाँ विश्व की क़रीब 80 फ़ीसदी आबादी बसी हुई है.
इस कार्यक्रम की वीडियो कवरेज यहाँ देखी जा सकती है.
यूएन विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहायक प्रशासक हाओडिएंग क्शू ने गुरूवार को न्यूयॉर्क मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए उसकी थीम का उल्लेख किया, जोकि विकासशील देशों के नेतृत्व में समाधानों और साझा नतीजों पर केन्द्रित थी.
उन्होंने कहा कि यह थीम एक शक्तिशाली वास्तविकता को परिलक्षित करती है: ‘ग्लोबल साउथ’ के देश न केवल स्वयं विकसित हो रहे हैं, बल्कि वे नवाचार (innovation), साझीदारी और समाधानों के स्रोत के रूप में उभर रहे हैं.
इस कोष की मदद से अब तक 94 परियोजनाएँ लागू की गई हैं, जिनमें से तीन करोड़ डॉलर से अधिक धनराशि के 40 प्रोजेक्ट का दायित्व यूएन विकास कार्यक्रम ने सम्भाला है. “एक साथ मिलकर, हमने दक्षिण-दक्षिण सहयोग को व्यावहारिक समाधानों में ढाला है, जिससे ज़िन्दगियाँ बेहतर हुई हैं, संस्थाओं को मज़बूती मिली है, और अवसरों का विस्तार हुआ है.”
उन्होंने कहा कि एक ऐसे समय जब पारम्परिक विकास सहायता योगदानों पर दबाव बढ़ रहा है, दक्षिण-दक्षिण सहयोग और बहुपक्षवाद पर केन्द्रित यह पहल, एकजुटता की भावना को व्यक्त करती है.
यह कोष यूएन विकास कार्यक्रम के सहयोग से संचालित किया जाता है, और इसका प्रबन्धन यूएन दक्षिण-दक्षिण सहयोग कार्यालय (UNOSSC) द्वारा किया जाता है.
यूएन कार्यालय की निदेशक दीमा अल ख़तीब ने कहा कि जिन देशों व समुदायों में ये विकास परियोजनाएँ लागू की गई हैं, उनके अनुभव दक्षिण-दक्षिण सहयोग के महत्व के सशक्त प्रमाण हैं, विशेष रूप से एक ऐसी दुनिया में जहाँ बढ़ते संकटों के बीच संसाधन लड़खड़ा रहे हैं.
उन्होंने बताया कि भारत-यूएन कोष के नतीजों को यूएन कार्यालय के प्रकाशनों और मंचों से साझा किया जाता है, ताकि अन्य भी इससे हुए बदलावों को जान सकें. इससे वैश्विक स्तर पर नीतिगत चर्चाओं में भी योगदान मिलता है.
निदेशक अल ख़तीब के अनुसार, भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) और डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में भारत के अनुभवों को अन्य देशों के साथ जोड़ा जा सकता है. ज्ञान के आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया के ज़रिए किसी एक देश में किए गए निवेश, अनेक के लिए प्रगति का स्रोत बन सकते हैं.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने अपने सम्बोधन में कहा कि इस पहल का उद्देश्य, विकास परियोजनाओं को मेज़बान देश के स्वामित्व में स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप लागू करना है.
“विकास के लिए सहयोग के प्रति हमारा दृष्टिकोण, वसुधैव कुटुम्बकम के हमारे सभ्यागत दर्शन पर आधारित है, जिसका अर्थ है: सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है…”
उन्होंने कहा कि भारत-यूएन कोष, इस संकल्प की एक व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, जिसमें विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को एक साथ लाया जाता है, जिन्हें वे ही तय करते हैं.
राजदूत पी. हरीश के अनुसार, इस कोष द्वारा समर्थित परियोजनाओं में सबसे कम विकसित देशों, भूमिबद्ध विकासशील देशों और लघु द्वीपीय विकासशील देशों की ज़रूरतों का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है.
अब तक, 64 सदस्य देशों में 94 विकास परियोजनाओं के लिए 8.2 करोड़ डॉलर आवंटित किए जा चुके हैं.
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक दौर पर आए भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख, सांसद संगीता कुमारी सिंह देव ने अपने सम्बोधन में कहा कि विकास के लिए सहयोग, भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख स्तम्भ है.
उन्होंने बताया कि भारत-यूएन कोष के ज़रिए विकास परियोजनाओं को समर्थन दर्शाता है कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग किस प्रकार देशों के स्वामित्व में समाधानों और सतत विकास लक्ष्यों की दिशा ले जा सकता है.
उनके अनुसार, यह उस समझ का परिचायक है कि विकास से लोगों को सशक्तिकरण होना चाहिए, हाशिए पर रहने वाले लोगों तक इसका लाभ पहुँचना चाहिए, और एक सतत भविष्य की बुनियाद तैयार होनी चाहिए.
इस कार्यक्रम में सेंट लूशिया, सेनेगल, किरिबाती, श्रीलंका, तंज़ानिया, वेनेज़ुएला, तुवालु, डोमिनिका, क्यूबा समेत अनेक देशों के स्थाई प्रतिनिधियों ने अपने देशों में लागू की गई परियोजनाओं से अवगत कराया.