विश्व के अधिकाँश हिस्सों में, पिताओं की तुलना में माताओं को कहीं ज़्यादा वैतनिक अवकाश (paid leave) मिलता है, मगर उसके साथ, देखभाल की ज़िम्मेदारी भी असमान रूप से स्वयं उन्हें ही उठानी पड़ती है. संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था की क़ीमत बच्चों, माताओं और पुरुषों को चुकानी पड़ रही है.
महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) और विश्व बैंक समूह ने गुरूवार को अपनी एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को आठ गुना अधिक सवेतन अवकाश मिलता है.
औसतन, माताओं को 196 दिनों के लिए वैतनिक अवकाश दिया गया, जबकि पिताओं के लिए यह आँकड़ा केवल 25 दिन था.
अवकाश की ऐसी व्यवस्था होने की वजह से पिताओं को बच्चों के साथ अधिक समय बिताने का अवसर नहीं मिल पाया, जबकि देखभाल की ज़िम्मेदारी महिलाओं को ही निभानी पड़ी.
इस अध्ययन के लिए 190 अर्थव्यवस्थाओं का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें 66 में पिताओं के लिए सवेतन अवकाश की कोई व्यवस्था ही नहीं है. शेष 124 देशों में से क़रीब 50 फ़ीसदी में, पिताओं को दो सप्ताह से भी कम वैतनिक अवकाश दिया जाता है.
माताओं के लिए भी हर जगह यह व्यवस्था नहीं है. 61 अर्थव्यवस्थाओं में, उन्हें मानक 14 सप्ताह से कम अवधि के लिए अवकाश मिलता है, जिसे अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा निर्धारित किया गया है. छह अर्थव्यवस्थाओं में उनके लिए ऐसा कोई विकल्प नहीं है.
यूएन वीमैन की उप कार्यकारी निदेशक न्यारादज़ायी गुम्बोनज़वांदा ने बताया कि देखभाल से हमारे परिवार, समाज और अर्थव्यवस्थाएँ पोषित होती हैं, मगर फिर भी इसकी ज़िम्मेदार असमान ढंग से महिलाएँ के कंधों पर ही आ रही है.
अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि अभिभावकों के काम पर वापिस लौटने के बाद भी, मातृत्व-पितृत्व देखभाल की यह असमानता, पारिवारिक जीवन को प्रभावित करती है.
जब पिता अवकाश लेते हैं, तो वे लम्बी अवधि तक बाल देखभाल और घर के कामकाज में ज़िम्मेदारी को साझा करते है. इससे महिलाओं पर बोझ कम होता है, जिन्हें अवैतनिक देखभाल कार्य के लिए पुरुषों की तुलना में प्रति दिन 2.5 गुना अधिक घंटों तक काम करना पड़ता है.
पितृत्व अवकाश को अक्सर माताओं के लिए अधिक कमाई और रोज़गार अवसरों से भी जोड़कर देखा जाता है. और अधिक संख्या में पुरुषों के अवकाश लेने से महिला सहकर्मियों के लिए मातृत्व अवकाश लेने के कारण होने वाले नुक़सान में कमी लाई जा सकती है.
बच्चों को भी इसका फ़ायदा मिल सकता है और पिताओं के समय अधिक साथ बिताने से अक्सर उन्हें भाषा सीखने, भावनाओं व व्यवहार को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
हालिया शोध दर्शाते हैं कि पुरुष, देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाने में और अधिक भूमिका के लिए तैयार हैं और 64 प्रतिशत ने सार्वजनिक देखभाल सेवाओं के लिए कर (tax) बढ़ाने का समर्थन किया है.
देखभाल केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं रहती है. हर चार में से एक अभिभावक अपने बुज़ुर्गों की भी देखभाल करते हैं और इसके लिए उन्हें अक्सर कोई समर्थन नहीं मिलता है.
यूएन वीमैन का कहना है कि मातृत्व-पितृत्व के बीच इस खाई को दूर करने के लिए यह ज़रूरी है कि सवेतन अवकाश की व्यवस्था में समता लाई जाए और ऐसी नीतियाँ अपनाई जाएं, जिनसे पिताओं को अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए प्रोत्साहन मिल सके.
इस व्यवस्था को अमल में लाने के लिए सामाजिक कल्याण उपायों की व्यवस्था की जानी भी आवश्यक होगी.