संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अमेरिकी प्रशासन द्वारा एक संस्थान के तौर पर अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) पर प्रतिबन्ध थोपे जाने की कठोर निन्दा की है और चिन्ता जताई है कि इस स्थिति में कोर्ट के लिए अपने दायित्वों को निभाने की क्षमता पर असर होगा.
संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने शुक्रवार को अपने एक वक्तव्य में आईसीसी को ईंट-दर-ईंट ढहा देने का संकल्प व्यक्त किया कि यह तब तक जारी रहेगा जब तक उनकी नज़र में अमेरिकी नागरिकों के लिए इसकी धमकी ख़त्म नहीं हो जाती.
उन्होंने प्रतिबन्धों की घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका, इस मनमानी करने वाली अदालत के साथ किसी तरह के सम्पर्क पर प्रतिबन्ध, उसके संसाधनों पर रोक लगाएगा और उसकी कार्यक्षमता को बुरी तरह कमज़ोर कर देगा. “अमेरिका कभी भी इस अदालत का सदस्य नहीं बना. हमें इसकी ज़रूरत नहीं है और न ही हम इसे चाहते हैं.”
यूएन महासचिव के प्रवक्ता स्तेफ़ान दुजैरिक ने शुक्रवार को अमेरिका के इस निर्णय की कड़ी आलोचना करते हुए इन प्रतिबन्धों को अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय के सामूहिक प्रयासों पर एक गम्भीर प्रहार क़रार दिया है.
उन्होंने कहा कि आईसीसी इस व्यवस्था का एक अहम स्तम्भ है लेकिन इन पाबन्दियों के कारण अपने महत्वपूर्ण अधिदेशों को निभा पाने की कोर्ट की क्षमता प्रभावित होगी.
यूएन प्रमुख ने आपराधिक न्यायालय की स्वतंत्रता और उसके अधिकारियों के लिए अपने अटूट समर्थन को दोहराया है और सभी देशों से अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अन्तर्गत तयशुदा दायित्वों को पूरा करने का आग्रह किया है.
यूएन महासभा ने 13 सितम्बर 2004 को आईसीसी के साथ सहयोग के विषय में एक समझौते को स्वीकृति दी थी, और संयुक्त राष्ट्र ने इसके लिए अपने संकल्प को दोहराया है.
आईसीसी ने अपने वक्तव्य में अमेरिकी प्रशासन के इस क़दम को अभूतपूर्व क़रार दिया है. इससे पहले, अमेरिका ने 13 न्यायाधीशों और अभियोजकों पर पाबन्दियाँ थोप दी थीं.
आईसीसी ने कहा कि “यह क़दम, क़ानून के शासन और अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था की बुनियाद पर किया गया एक प्रहार है.”
कोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कार्रवाई अदालत में गतिविधियों में व्यवधान लाने और उन लोगों को डराने-धमकाने के लिए हैं, जो कोर्ट के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं.
आईसीसी के प्रमुख तोमोको अकाने ने पुरज़ोर ढंग से कहा कि वह पूरी स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटेगी, और गम्भीर अपराधों के अनगिनत पीड़ितों के लिए केवल क़ानून व साक्ष्यों के आधार पर अपनी कार्रवाई करेगी.
“न्याय के उद्देश्य की सेवा करने के लिए किसी को भी दंडित नहीं किया जाना चाहिए. इतिहास, इस क्षण का निर्णय करेगा.”
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अलग से जारी अपने एक वक्तव्य में चेतावनी दी है कि अमेरिकी प्रतिबन्ध, गम्भीरतम अपराधों के दोषियों को जवाबदेह ठहराने वाली सामूहिक अन्तरराष्ट्रीय क़ानून व्यवस्था को ध्वस्त करने की एक कोशिश है.
उन्होंने क़ानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध देशों से आग्रह किया है कि आपराधिक न्यायालय व उसकी स्वतंत्रता के लिए एकजुट होकर खड़ा रहना होगा.