भारत के पश्चिम बंगाल राज्य और विभिन्न अन्य हिस्सों में हर वर्ष धूमधाम से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है. यह एक जीवन्त विरासत, भक्ति, संस्कृति, सार्वजनिक कला और सामाजिक सन्देशों को एक साथ लाने का अवसर है. इस उत्सव और पूजा पंडालों में हर एक व्यक्ति की पहुँच को आसान बनाने के उद्देश्य से इस वर्ष भी साझा प्रयास किए गए हैं.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने 2021 में दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया था, जिसमें पूजा समितियों के साथ-साथ परिवारों, पुरोहितों, ढोल वादक, कलाकारों, शिल्पकारों को इस परम्परा के संरक्षक के रूप में मान्यता दी गई है.
हर वर्ष, दुर्गा पूजा के लिए चमचमाते अस्थाई मन्दिर (पंडाल) बनाए जाते हैं, जोकि अलग-अलग थीम पर भी आधारित होते हैं. मिट्टी से देवी की प्रतिमाओं को गढ़ा जाता है. सड़कों पर ढोल वादकों की गूँज होती है.
सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं और लोग रौशनी से जगमगाते एक पंडाल से दूसरे पंडाल की सैर करने के लिए निकल पड़ते हैं. इस वर्ष, दुर्गा पूजा का आयोजन 16 से 21 अक्टूबर तक होगा.
मगर, बड़ी संख्या में विकलांगजन, वृद्धजन और गर्भवती महिलाएँ इस विशाल उत्सव का पूर्ण अनुभव कर पाने से अक्सर वंचित रह जाते थे, चूँकि उनके लिए इन पंडालों में प्रवेश कर पाना कठिन होता था.
असमतल ज़मीन, सीढ़ियाँ, अत्यधिक भीड़भाड़, प्रकाश की कम व्यवस्था और बहुत अधिक शोर, ऐसी अनेक कठिनाइयाँ हैं, जोकि अक्सर लोगों के लिए परेशानी बन जाती हैं.
दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को के क्षेत्रीय कार्यालय में संस्कृति मामलों की प्रमुख माआले हज़ाज़ ने कहा कि दुर्गा पूजा, एक जीवन्त विरासत है जिसे इसे मनाने वाले लोग आकार देते हैं और आगे बढ़ाते हैं.
“मगर सामूहिक भागेदारी की वास्तविक भावना तभी साकार हो सकती है, जब हर व्यक्ति इन उत्सवों का समान रूप से अनुभव कर सके और उनमें हिस्सा ले सके.”
इन मुश्किलों को समझते हुए और उत्सव में उपस्थिति को सभी के लिए आसान बनाने, उसे बढ़ावा देने के लिए भारत में यूएन कार्यालय, यूनेस्को, और पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा साझा प्रयास किए जा रहे हैं. 2025 में शुरू की गई इस पहल का यह दूसरा वर्ष है, जिसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर, का भी समर्थन मिला है.
ये उपाय संयुक्त राष्ट्र के ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन’ और भारत के ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016’ पर आधारित है.
इस विषय में, आयोजकों को ज़रूरी दिशानिर्देशों की ट्रेनिंग दी गई है और दुर्गा पूजा समितियों को व्यावहारिक उपाय अपनाने के लिए कहा गया है. इनमें शामिल हैं:
दुर्गा पूजा, बुराई पर देवी दुर्गा की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. लेकिन इसके साथ ही यह अकेलेपन पर सामूहिकता की विजय भी है. इस सांस्कृतिक उत्सव को विकलांगजन, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और चलने-फिरने में परेशानी महसूस करने वाले व्यक्तियों के लिए सुलभ बनाने से इसी मूल भावना को साकार किया जा सकता है.
यूएन इंडिया और यूनेस्को का मानना है कि दुर्गा पूजा को सुलभ बनाने का यह प्रयास देशभर के अन्य सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों के लिए आदर्श बन सकता है.