बेहतर जीवन और सुरक्षा की तलाश में किसी योरोपीय देश पहुँचने की चाह में हज़ारों बच्चे, अपनी जान जोखिम में डाल कर, अकेले कठिनाइयों भरी यात्राएँ कर रहे हैं. एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष योरोप पहुँचने वाले शरणार्थी व प्रवासी बच्चों में से दो-तिहाई, लगभग 20 हज़ार ने अकेले ही ये सफ़र तय किया है और अनेक को इस दौरान शोषण का सामना करना पड़ा.
अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी (IOM) ने बताया कि योरोप तक की यात्रा तय करने के लिए प्रवासी मुख्य रूप से, उत्तरी अफ़्रीका में लीबिया और ट्यूनीशिया से इटली का रुख़ करते हैं.
2025 में, बुलगारिया, साइप्रस, ग्रीस, इटली, माल्टा और स्पेन समेत अन्य योरोपीय देशों में 31 हज़ार से अधिक बच्चे पहुँचे, जिनमें से 20 हज़ार या तो अकेले आए थे, या फिर अपने माता-पिता या अभिभावक से अलग हो गए थे.
इनमें से बहुत से बच्चों के लिए यह यात्रा, जीवित रहने के लिए एक संघर्ष बन गई, जहाँ उन्हें दबाव और शोषण का शिकार बनना पड़ा.
बांग्लादेश के एक 19 वर्षीय प्रवासी कामगार ने बताया कि लीबिया में उनके मालिक ने पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया और उन्हें बंधुआ मज़दूरी की ओर धकेल दिया. इस दौरान, मेहनत से काम न करने का आरोप लगाकर अक्सर पिटाई की जाती थी.
वहीं, लाइबेरिया की एक 20 वर्षीय महिला ने बताया कि अल्जीरिया पहुँचने के बाद उनका बलात्कार किया गया और फिर एक सफ़ाईकर्मी के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया. सात महीने की गर्भावस्था के बाद, वह किसी तरह से वहाँ से बच निकलने में सफल रहीं और फिर एक नाव के ज़रिए स्पेन पहुँची.
बाल प्रवासियों पर आधारित नए आँकड़े बुधवार को जारी किए गए हैं, जिनमें कामकाज और शरण की तलाश के दौरान उनके साथ होने वाले भयावह बर्ताव को उजागर किया गया है.
यूएन प्रवासन एजेंसी ने योरोपीय देशों और प्रवासन मार्गों में स्थित अन्य देशों के बीच मज़बूत सहयोग पर बल दिया है, ताकि अकेले सफ़र तय कर रहे बच्चों की रक्षा की जा सके.
साथ ही, मानव तस्करों और आपराधिक नैटवर्क पर लगाम कसने के लिए भी ज़रूरी उपायों पर बल दिया गया है.