बचे हुए खाने को जब फेंक दिया जाता है, तो वह सड़ता है और कचरा स्थल पर अन्य कूड़े के साथ मिलकर मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की वजह बनता है. जोकि वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु में बदलाव की ज़िम्मेदार है. संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण एजेंसी (UNEP) का कहना है कि भोजन की बर्बादी से कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 10 फ़ीसदी तक पैदा होता है, जोकि विमानन सैक्टर की तुलना में पाँच गुना अधिक है.
यदि इस स्थिति की उपेक्षा कर दी जाए तो भोजन की बर्बादी, जलवायु संकट की एक बड़ी वजह बन सकती है, और इसीलिए इस ख़तरे से निपटने के लिए नए समाधान अपनाए जा रहे हैं: काले रंग की 'सैनिक मक्खियों' (black soldier flies) से लेकर कचरा बीनने वाले लोगों के सशक्तिकरण तक.
बचे-खुचे आहार से लेकर पैदावार के बाद ख़राब हो गई फ़सलों या भंडारण केन्द्रों तक पहुँचने से पहले ख़राब हो गई खाद्य सामग्री, भोजन की बर्बादी अनेक स्तरों पर होती है. लेकिन इसका सबसे अधिक हानिकारक रूप, रसोई में बेकार जाने वाला, सड़ने वाला भोजन है, जिसे कचरे में फेंक दिया जाता है.
जब बचा हुआ खाना कचरे के ढेर में दब जाता है और वहाँ ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाती है, तो यह सूक्ष्मजीवों की मदद से मीथेन गैस का उत्पादन करता है.
यूएन ने चेतावनी दी है कि मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस, वैश्विक तापमान में वृद्धि के लिए लगभग एक-तिहाई हिस्से तक ज़िम्मेदार हैं और पर्यावरण के लिए विशेष तौर से हानिकारक है. यह 20 वर्ष की अवधि के दौरान कार्बन डाऑक्साइड की तुलना में 86 फ़ीसदी अधिक ताप सोखती हैं.
सड़ा हुआ, कचरे में फेंक दिया गया भोजन विश्व भर में मीथेन उत्सर्जन के लिए एक बड़ा कारण है.
संयुक्त राज्य अमेरिका में ठोस कचरा जमा करने वाले स्थल, मानव गतिविधियों के कारण होने वाले मीथेन गैस उत्सर्जन का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत हैं.
यूएन पर्यावरण एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में विशाल मात्रा में भोजन की बर्बादी होती है और हर दिन एक अरब से अधिक आहार (meals) को बिना खाए ही छोड़ दिया जाता है. बर्बाद होने वाले भोजन के इस पहाड़ के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से के लिए घर-परिवार जिम्मेदार हैं.
बिना खाए ही फेंक दिए गए इस भोजन के उत्पादन में जिन संसाधनों को इस्तेमाल में लाया गया था, वे भी बर्बाद हो जाते हैं.
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का अनुमान है कि 1.4 अरब हैक्टेयर भूमि, यानि विश्व में कृषि-योग्य भूमि का लगभग 28 प्रतिशत, ऐसी खाद्य सामग्री के उत्पादन में इस्तेमाल में लाया जाता है, जिसे कभी नहीं खाया जाएगा.
इस प्रक्रिया में, खेती-बाड़ी और भोजन को तैयार करने में उपयोग में आने वाले जल की भी बर्बादी होती है.
कृषि भूमि का विस्तार, वनों की कटाई और उनका आकार घटते जाने की एक बड़ी वजह है. यानि खाने की बढ़ती बर्बादी, पेड़ों की अनावश्यक कटाई की वजह बन रही है और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की उनकी क्षमता पर भी असर डाल रही है.
सड़े हुए भोजन से मीथेन गैस उत्सर्जित होती है, मगर यह वातावरण में अधिक समय तक नहीं रहती है और कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में जल्द ख़त्म हो जाती है. इसलिए, मीथेन गैस उत्सर्जन में कटौती के ज़रिए कुछ ही दशकों में जलवायु मोर्चे पर प्रगति हासिल की जा सकती है.
यूएन पर्यावरण एजेंसी में विशेषज्ञ मार्टिन क्राउस ने बताया कि एक ऐसे समय में जब दुनिया, वैश्विक तापमान में वृद्धि की रफ़्तार को कम करने के लिए व्यावहारिक तरीक़ों की तलाश कर रही है, भोजन की बर्बादी को रोकना एक तात्कालिक और किफ़ायती जलवायु समाधान साबित हो सकता है.
हालांकि, FAO ने आगाह किया है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर संकल्प व्यक्त किए जाने के बावजूद, वर्ष 2015 के बाद से अब तक भोजन हानि में कमी लाने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं हुई है. टिकाऊ विकास एजेंडा के तहत, 2030 तक वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति भोजन बर्बादी में 50 फ़ीसदी तक की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अभी यह दूर नज़र आ रहा है.
अपनी थाली में खाना न छोड़ने के अलावा, मीथेन गैस को कम करने के लिए दुनिया भर में कई प्रभावी तरीक़े अपनाए जा रहे हैं.
अफ़्रीकी महाद्वीप में 11 देशों की सरकारों ने मीथेन उत्सर्जन कम करने के इरादे से कचरा बीनने वाले लोगों को औपचारिक कचरा प्रबन्धन व्यवस्था में शामिल करने की पहल की है. उन्हें जैविक कचरे को अलग करने और उससे खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
यूएन पर्यावरण एजेंसी के ‘जलवायु एवं स्वच्छ वायु गठबन्धन’ (Climate and Clean Air Coalition) के तहत इन उपायों को आर्थिक मदद दी गई है. इससे कचरा बीनने वाले लोगों की आजीविका बेहतर हुई है, लोगों में कचरे को अलग-अलग करने के प्रति जागरूकता बढ़ी है और सामुदायिक स्तर पर खाद बनाने की जगह बनाई गई हैं.
खाद बनाने के एक विकल्प के रूप में, विश्व भर में विशेष केन्द्रों में पाली जाने वाली ‘ब्लैक सोल्जर मक्खियों’ का इस्तेमाल जैविक कचरे को उपयोगी पदार्थ में बदलने के लिए किया जा रहा है. मलावी से लेकर युगांडा तक, ये उपयोगी कीड़े कई गाँवों और शहरों की कचरा प्रबन्धन व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं.