संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शुक्रवार को 'अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के अवसर पर कहा है कि दरारों व टकरावों के इस दौर में, महात्मा गाँधी का जीवन एक प्रेरक उदाहरण है कि शान्ति पथ पर अडिग रहकर किस तरह से चिरस्थाई बदलाव लाया जा सकता है. इसी सिलसिले में, यूएन में भारत के स्थाई मिशन ने एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया है, जिसकी वीडियो कवरेज यहाँ देखी जा सकती है.
अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, हर वर्ष 2 अक्टूबर को महात्मा गाँधी के जन्म दिवस पर मनाया जाता है. महात्मा गाँधी, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की एक अग्रणी हस्ती हैं, जिन्होंने अहिंसा के दर्शन को आगे बढ़ाया और उसे स्वाधीनता के लिए संघर्ष में एक कारगर उपकरण बनाया.
यूएन महासभा ने, जून 2007 में, प्रस्ताव ARES/61/271 पारित करके, हर वर्ष 2 अक्टूबर को ‘अन्तरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाए जाने की घोषणा की थी.
इस प्रस्ताव को 140 देशों ने मिलकर प्रायोजित किया था. इस दिवस का उद्देश्य, विश्व भर में शिक्षा व जनजागरूकता के माध्यम से, अहिंसा के सन्देश का प्रसार करना है.
यूएन महासभा के प्रस्ताव में “अहिंसा के सिद्धान्त की सार्वभौमिक प्रासंगिकता” और “शान्ति, सहिष्णुता, समझ व अहिंसा की संस्कृति स्थापित करने” की इच्छा की भी सम्पुष्टि की गई है.
यूएन महासचिव ने इस अवसर पर जारी अपने सन्देश में महात्मा गाँधी के जीवन व विरासत को असाधारण बताया.
“जीवन-पर्यन्त, गाँधी ने एक प्रेरणास्पद उदाहरण सामने रखा कि शान्ति के सिद्धान्तों पर अडिग रहकर किस तरह से गहरे, चिरस्थाई बदलावों को स्थापित किया जाए.”
“उन्होंने दर्शाया कि अन्याय का विरोध करने का सर्वोत्तम तरीक़ा, व्यवस्थागत भेदभाव व दमन की क्रूरता व हिंसा को दोहराना नहीं है, बल्कि उसके बजाय, सम्वाद व अहिंसा के ज़रिए समझ के पुलों का निर्माण करना, गरिमा प्रदान करना और स्थाई परिवर्तन लाना है.”
यूएन प्रमुख ने सचेत किया कि बढ़ते विभाजनों, तनावों और टकराव के इस दौर में, महात्मा गाँधी के जीवन से मिले सबक़ नए सिरे से प्रासंगिक हो गए हैं.
“लोग पीड़ा में हैं. निर्धनता और असमानता, साधन-सम्पन्न और साधन-विहीन लोगों के बीच खाई पैदा कर रहे हैं. और शान्ति व विकास की बुनियाद – यूएन चार्टर, मानवाधिकार, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, कूटनीति, सम्वाद – की उपेक्षा की जा रही है और दंडहीनता की भावना के साथ उनका मखौल उड़ाया जा रहा है.”
इस पृष्ठभूमि में, यूएन महासचिव ने कहा कि हमें उसी साहस, सहानुभूति, गरिमा व साझा मानवता का सहारा लेना होगा, जिसका उदाहरण महात्मा गाँधी ने अपने पूरे जीवन में प्रस्तुत किया.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें शान्ति व विकास में अहिंसा की भूमिका पर ध्यान केन्द्रित किया गया.
भारतीय राजदूत पी. हरीश ने अनेक देशों के प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह अन्तरराष्ट्रीय दिवस, महात्मा गाँधी की अमर विरासत को सम्मान देने का एक अवसर है. उनके सिद्धान्त हमारी आपस में जुड़ी हुई दुनिया में शान्ति की संस्कृति के निर्माण में आज भी प्रासंगिक हैं.
उन्होंने कहा कि हम जिस तरह से अनिश्चितता और भूराजनैतिक सम्बन्धों में एक उथलपुथल भरे दौर का सामना कर रहे हैं, गाँधी जी का अहिंसा सिद्धान्त, टकराव का समाधान ढूंढने, शान्ति को प्रोत्साहन देने, और विकास पथ की ओर बढ़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है.
यूएन में भारत के स्थाई प्रतिनिधि ने बताया कि महात्मा गाँधी का यह मानना था कि हिंसा, केवल युद्ध में नहीं है बल्कि निर्धनता, शोषण और असमानता में भी व्याप्त है. इसलिए, उन्होंने सामाजिक बदलाव की दिशा में क़दम बढ़ाने के लिए अहिंसा को सबसे कारगर सिद्धान्त के रूप में अपनाया.
राजदूत पी. हरीश ने कहा कि उनके विचार हमें टिकाऊ जीवनशैली अपनाने और पृथ्वी की रक्षा के प्रति अपने दायित्व को निभाने का सन्देश देते हैं. आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन पर महात्मा गाँधी ने बल दिया, जोकि एक ऐसे विश्व के लिए विशेष तौर पर प्रासंगिक है जोकि निरन्तर बदलती परिस्थितियों और व्यवधानों से जूझ रहा है.