फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने गुरुवार को यूएन महासभा को आगाह किया कि इसराइल की नीतियों से फ़लस्तीनियों का अपने ही देश में “जीवन और अस्तित्व” ख़तरे में है. उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से एक और नकबा – क़रीब सात दशक पहले लाखों फ़लस्तीनियों का सामूहिक विस्थापन – नहीं होने देने की अपील की.
फ़लस्तीनी प्रतिनिधिमंडल को लगातार दूसरे वर्ष अमेरिकी वीज़ा नहीं मिलने के कारण, राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने यूएन महासभा की जनरल डिबेट को पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो सन्देश के ज़रिए सम्बोधित किया. उन्होंने इस निर्णय को ग़ैरक़ानूनी और मेज़बान देश के रूप में अमेरिका के दायित्वों का उल्लंघन बताया.
उन्होंने अमेरिकी प्रशासन से इस तरह के फ़ैसले वापस लेने और “संवाद व आपसी सम्मान की भाषा अपनाने” की अपील की.
महमूद अब्बास ने कहा कि ग़ाज़ा में फ़लस्तीनियों को हत्याओं, तबाही, भुखमरी, जबरन विस्थापन के प्रयासों और जनसंहारक युद्ध का सामना करना पड़ रहा है. वहीं, पश्चिमी तट में इसराइली बस्तियों का विस्तार तेज़ हो रहा है.
उन्होंने कहा कि पूर्वी येरूशेलम को अलग-थलग किया जा रहा है और इसराइली बस्तियों के बाशिन्दों की आतंकी हिंसा बढ़ रही है. ज़मीन हड़पने, घर गिराने, रास्ते बन्द करने और छापेमारी की घटनाएँ भी जारी हैं.
महमूद अब्बास ने कहा कि ग़ाज़ा, पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशेलम में जो हो रहा है, वह “अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं”, बल्कि एक “दुर्भावनापूर्ण औपनिवेशिक योजना” का हिस्सा है. इसका मक़सद फ़लस्तीनियों का जीवन कठिन बनाना और उन्हें अपनी ज़मीन छोड़ने पर मजबूर करना है.
उन्होंने सवाल किया, “कुछ देश इसराइल के मामले में कब तक चुप रहेंगे या कब तक उसे वे हथियार देते रहेंगे, जिनका इस्तेमाल वह हमारे लोगों के ख़िलाफ़ करता है?”
महमूद अब्बास ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की 20-सूत्रीय योजना और उसका समर्थन करने वाले सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 का स्वागत किया था, लेकिन अब तक ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है.
वर्ष 2027 में संक्रमणकालीन अवधि समाप्त होने से पहले, उन्होंने योजना का दूसरा चरण बिना देरी लागू करने की अपील की, ताकि ग़ाज़ा और पूर्वी येरूशेलम समेत पश्चिमी तट को फिर एकजुट किया जा सके. उन्होंने इसके लिए “एक देश, एक सरकार, एक क़ानून और हथियारों पर एकमात्र वैध नियंत्रण” के सिद्धान्त पर ज़ोर दिया.
उन्होंने इसराइल की E1 बस्ती विस्तार योजना के प्रति आगाह किया. उनके अनुसार, इससे पूर्वी येरूशेलम आसपास के फ़लस्तीनी इलाक़ों से कट जाएगा. उन्होंने बस्तियों के विस्तार पर रोक सम्बन्धी सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 को लागू करने की भी माँग की.
महमूद अब्बास ने फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA ) को निरन्तर समर्थन देने की अपील की. उन्होंने कहा कि शरणार्थियों का मुद्दा अनसुलझा रहने तक “इस एजेंसी का कोई विकल्प नहीं है.”
उन्होंने इसराइल से फ़लस्तीनियों की रोकी गई छह अरब डॉलर से अधिक की धनराशि जारी करने की भी माँग की.
दो-राष्ट्र समाधान को आगे बढ़ाने वाले न्यूयॉर्क घोषणापत्र को महासभा की मंज़ूरी मिलने के एक वर्ष बाद महमूद अब्बास ने कहा, “हमने अपनी प्रतिबद्धताएँ पूरी की हैं.”
उन्होंने सार्वजनिक वित्त, सामाजिक सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO ) के सहयोग से स्कूली पाठ्यक्रमों में किए गए सुधारों का ज़िक्र किया.
उन्होंने बताया कि 28 नवम्बर को विधायी चुनाव होंगे. इसके बाद फ़लस्तीनी राष्ट्रीय परिषद का नवीनीकरण और राष्ट्रपति चुनाव होंगे.
उन्होंने कहा, “हम एक ऐसा लोकतांत्रिक फ़लस्तीनी राष्ट्र चाहते हैं, जहाँ क़ानून का शासन हो और मानवाधिकारों का सम्मान किया जाए. एक निःशस्त्र राष्ट्र, जो इसराइल के साथ शान्ति और सुरक्षा से रह सके.”
महमूद अब्बास ने फ़लस्तीन को मान्यता देने वाले 160 देशों का आभार जताया और अन्य देशों से भी ऐसा करने की अपील की. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन की पूर्ण सदस्यता की माँग भी दोहराई.
उन्होंने कहा, “हम अपना वतन नहीं छोड़ेंगे. हम विस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे. हम किसी और को अपना भविष्य तय नहीं करने देंगे.”