विश्व भर में हिंसक टकरावों और युद्धग्रस्त इलाक़ों में फँसे बच्चे, इन संकटों की सबसे बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं. 2025 में, उनके अधिकारों के गम्भीर उल्लंघन मामलों की संख्या अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई, और यह पहली बार है जब अधिकाँश मामलों के लिए सरकारी सुरक्षा बलों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.
बच्चों व सशस्त्र टकराव पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ़्रेज़ियर ने सोमवार को सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों को बाल अधिकारों के उल्लंघन मामलों पर नवीनतम आँकड़ों से अवगत कराया.
2025 में, संयुक्त राष्ट्र ने गम्भीर उल्लंघन के 38,558 मामलों की पुष्टि की, जिनसे 24 हज़ार से अधिक बच्चे प्रभावित हुए. यह दर्शाता है कि बहुत से बच्चों को एक से अधिक प्रकार के उल्लंघनों का सामना करना. प्रभावित बच्चों में लगभग एक-तिहाई लड़कियाँ बताई गई हैं.
संयुक्त राष्ट्र अपनी विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से हिंसक टकराव से प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों के जीवन में सुधार लाने के लिए निरन्तर प्रयासरत है.
कुछ उदाहरणों पर एक नज़र:
बच्चों के विरुद्ध सबसे अधिक गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले, इसराइल और क़ाबिज़ फ़लस्तीनी क्षेत्र (12,445), काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (4,114), नाइजीरिया (2,560), म्याँमार (2,203) और सोमालिया (2,195) में दर्ज किए गए.
वैनेसा फ़्रेज़ियर ने बताया कि ऐसा पहली बार हुआ है कि बच्चों के विरुद्ध गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए सरकारी बल सबसे अधिक ज़िम्मेदार पाए गए. “यह बहुत परेशान कर देने वाला है.”
1996 में, सशस्त्र टकराव और बच्चों के विषय पर संयुक्त राष्ट्र का अधिदेश (mandate) स्थापित किया गया था. इसके बाद, 2005 में, सुरक्षा परिषद ने चिन्ताजनक हालात में फँसे हुए बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन मामलों की निगरानी करने और उनसे जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए एक तंत्र स्थापित किया गया.
यूएन महासचिव अपनी रिपोर्ट में उन युद्धरत पक्षों का उल्लेख करते हैं, जिन सरकारी सुरक्षा बलों या ग़ैर-सरकारी हथियारबन्द समूहों द्वारा इनमें से एक या उससे अधिक हनन मामलों को अंजाम दिया जाता है.
इसके तहत, छह प्रकार के बाल अधिकार उल्लंघन मामले निर्धारित किए गए हैं.
पिछले तीन दशकों के दौरान, 2.2 लाख बच्चों को सशस्त्र बलों और हथियारबन्द गुटों से आज़ाद करा पाना भी सम्भव हुआ है, मगर बजट कटौतियों के कारण समाज की मुख्यधारा में लाने पर केन्द्रित कार्यक्रम कमज़ोर हो रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने सदस्य देशों को बताया कि सशस्त्र ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) द्वारा संचालित हथियारों और डिजिटल टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, और इससे बाल सैनिकों के रूप में भर्ती, शोषण व दुर्व्यवहार के नए रास्ते भी खुल रहे हैं.
उन्होंने बताया कि बच्चों का संरक्षण केवल उल्लंघन मामलों की रोकथाम करना नहीं है. यह जीवित बच गए बच्चों को उबरने में मदद देना भी है. यूनीसेफ़ प्रमुख ने पिछले वर्ष दिसम्बर में दक्षिण सूडान में अपनी यात्रा का उल्लेख किया, जहाँ उन्होंने भयावह हिंसा से गुज़री लड़कियों व महिलाओं से मुलाक़ात की थी.
इस पीड़ा से गुज़रने के बाद जीवित बची दो महिलाओं ने अपनी जान लेने के बारे में भी सोचा था, मगर फिर उन्हें यूनीसेफ़-समर्थित एक केन्द्र पर समर्थन, सुरक्षित आश्रय व परामर्श मिला.
इन केन्द्रों की अहमियत के बावजूद, सहायता धनराशि में कटौतियों की वजह से दक्षिण सूडान में एक-तिहाई से अधिक केन्द्र बन्द कर दिए गए हैं, जबकि लाखों बच्चों को बचाने के लिए दोगुने प्रयासों की आवश्यकता है.