म्याँमार से बड़े पैमाने पर विस्थापन के नौ वर्ष बाद भी रोहिंग्या संकट दुनिया के सबसे लम्बे और जटिल शरणार्थी संकटों में से एक बना हुआ है. वर्षों के उत्पीड़न और घर वापसी को लेकर अनिश्चितता के बीच उनका भविष्य अब भी अधर में लटका है.
संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने बुधवार को रोहिंग्या संकट के स्थाई समाधान की फिर पुकार लगाई, ताकि शरणार्थियों की सुरक्षित व सम्मानजनक घर वापसी के साथ न्याय और जवाबदेही भी सुनिश्चित हो सके.
यूएन महासभा के 81वें सत्र से इतर एक उच्चस्तरीय बैठक में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त बरहम सालेह ने बताया कि लगभग 12 लाख रोहिंग्या शरणार्थी अब भी बांग्लादेश में रह रहे हैं.
उन्होंने कहा, “एक पूरी पीढ़ी अपने घर से दूर बड़ी हो रही है… म्याँमार में टकराव जारी है और फ़िलहाल स्वैच्छिक, सुरक्षित, सम्मानजनक व टिकाऊ वापसी के लिए ज़रूरी परिस्थितियाँ मौजूद नहीं हैं.”
अगस्त 2017 में म्याँमार की सेना ने पश्चिमी राख़ीन प्रान्त में व्यापक सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, जिसके कारण लाखों रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण लेने को मजबूर हुए. इनमें से अधिकाँश अब भी वहीं शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं.
म्याँमार के लिए महासचिव की विशेष दूत जूली बिशप ने कहा कि वर्ष 2017 में जन्मे बच्चों का पूरा बचपन विस्थापन में बीता है.
उन्होंने बताया, “अनुमान है कि हर वर्ष शिविरों में 30 हज़ार से अधिक बच्चों का जन्म होता है.”
विशेष दूत ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों के लिए लिंग-आधारित हिंसा का ख़तरा बढ़ रहा है, जिसमें सशस्त्र समूहों और आपराधिक नैटवर्क से जुड़ी हिंसा भी शामिल है. वहीं, संरक्षण सेवाओं तक उनकी पहुँच घट रही है.
उन्होंने कहा, “युवा पीढ़ी उम्मीद खो रही है.”
यूएन अधिकारियों ने रोहिंग्या शरणार्थियों को आश्रय देने में बांग्लादेश की असाधारण उदारता की सराहना की, लेकिन आगाह किया कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय उसे यह ज़िम्मेदारी अकेले उठाने के लिए नहीं छोड़ सकता.
UNHCR प्रमुख ने कहा, “वित्तीय सहायता ख़त्म होने का मतलब यह नहीं कि लोगों की ज़रूरतें भी ख़त्म हो गई हैं. इससे भोजन, शिक्षा और अवसर घटते हैं, स्वास्थ्य व अन्य आवश्यक सेवाओं पर दबाव बढ़ता है और परिवारों की हताशा गहराती है.”
सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की सम्भावना के अभाव में रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए शोषण, मानव तस्करी, जबरन भर्ती और ख़तरनाक समुद्री यात्राओं का जोखिम बढ़ रहा है.
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने अपने सम्बोधन में लम्बे समय से जारी विस्थापन के कारण रोहिंग्या शरणार्थियों और उन्हें शरण देने वाले स्थानीय समुदायों पर बढ़ते बोझ की ओर ध्यान दिलाया.
उन्होंने कहा, “लम्बे समय से जारी अनिश्चितता और सामान्य जीवन में व्यवधान से नई चुनौतियाँ और सुरक्षा जोखिम बढ़ रहे हैं, जिनमें मानव तस्करी,प्रवासियों की तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य सीमा-पार अपराध शामिल हैं.”
उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय साझीदारों के समर्थन के लिए आभार जताया, लेकिन ज़ोर दिया कि बांग्लादेश की उदारता को राजनैतिक कार्रवाई न करने का बहाना नहीं बनाया जा सकता.
उन्होंने कहा, “बांग्लादेश से भी अनिश्चित काल तक यह ज़िम्मेदारी उठाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती.”
प्रधानमंत्री ने कहा, “इस संकट की शुरुआत म्याँमार में हुई थी और इसका समाधान भी म्याँमार में ही है.”
यूएन महासभा अध्यक्ष ख़लीलुर रहमान ने चिन्ता जताई कि राख़ीन प्रान्त समेत म्याँमार के अन्य हिस्सों में हिंसा और उत्पीड़न जारी है.
उन्होंने कहा, “आम नागरिक अन्धाधुन्ध हमलों, हवाई बमबारी, मनमानी गिरफ़्तारी, यातना, जबरन गुमशुदगी और भर्ती का सामना कर रहे हैं. उनके घर व नागरिक बुनियादी ढाँचे तबाह किए जा रहे हैं और उन्हें मानवीय सहायता से भी वंचित रखा जा रहा है.”
महासभा अध्यक्ष ने रोहिंग्या संकट को अन्तरराष्ट्रीय एजेंडा में बनाए रखने के लिए निरन्तर राजनैतिक प्रयासों और भरोसेमन्द मानवीय सहायता पर ज़ोर दिया.
यूएन अधिकारियों ने म्याँमार के ख़िलाफ़ गाम्बिया द्वारा अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में दायर जनसंहार के मामले का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि न्याय किसी भी स्थाई समाधान का अभिन्न हिस्सा है और जवाबदेही के प्रयासों की गति कम नहीं पड़नी चाहिए.
महासभा अध्यक्ष ने कहा, “पीड़ितों को भरोसा होना चाहिए कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय अतीत की भयावह घटनाओं को दोहराए जाने से रोकने के लिए हरसम्भव प्रयास कर रहा है.”
यूएन शरणार्थी उच्चायुक्त बरहम सालेह ने ज़ोर दिया कि शरणार्थियों को केवल गुज़र-बसर के लिए सहारा नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य चाहिए.
रोहिंग्या शरणार्थियों से अपनी बातचीत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अनेक लोग अब भी घर लौटने की उम्मीद लगाए हुए हैं. लेकिन वापसी का अर्थ केवल सीमा पार करना नहीं है.
उन्होंने कहा, “इसका मतलब है अधिकारों के साथ घर लौटना, स्वतंत्र आवाजाही, शिक्षा, रोज़गार और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच, अन्य समुदायों के साथ बिना डर के रहना और नागरिकता पाने का अवसर.”
उन्होंने कहा, “हमारी ज़िम्मेदारी ऐसे भविष्य को सम्भव बनाना है.”