दक्षिण सूडान में पशुपालकों के लिए उनके मवेशी, आय के स्रोत से कहीं बढ़कर हैं. ये उनकी प्रतिष्ठा, सम्पत्ति का हिस्सा होने के अलावा उनके पारिवारिक जीवन का भी अहम अंग हैं. ऐसे में, किसी पशु के बीमार या घायल होने के समय चिकित्सा सेवाओं का अभाव उनके लिए समस्या बन सकता है. संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNMISS) में तैनात भारतीय शान्तिरक्षक पशु शिविरों में निशुल्क उपचार और दवाओं के ज़रिए इसी कमी को पूरा करने में जुटे हैं.
विश्व के सबसे युवा देश, दक्षिण सूडान ने वर्ष 2011 में सूडान से स्वाधीनता हासिल की थी, मगर उसके बाद से ही यह देश, टकराव और अस्थिरता से जूझता रहा है. संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNMISS) के ध्वज तले तैनात यूएन शान्तिरक्षक वहाँ स्थाई शान्ति की स्थापना, आम नागरिकों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए निरन्तर प्रयासरत हैं.
दक्षिण सूडान के अनेक समुदायों के लिए पशु (गाय, बकरी, भैंस) भोजन, आमदनी और सुरक्षा का अहम आधार है. मगर, बीमारियों के दौरान पशु चिकित्सा सेवाओं की कमी, परिवारों को संकट में डाल सकती है.
देश के जोंगलेई प्रान्त में स्थानीय आबादी के लिए उनके किसी मवेशी का स्वास्थ्य बिगड़ना या चोटिल होना, समुदाय के ही किसी सदस्य की तबीयत ख़राब हो जाने जैसा है. लेकिन ऊँची क़ीमतों और मवेशी शिविरों के दूरदराज़ के इलाक़ों में होने की वजह से अक्सर पशु चिकित्सा सेवाएँ आम लोगों की पहुँच से दूर हो जाती हैं.
स्थानीय ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, दक्षिण सूडान में यूएन मिशन में तैनात भारतीय पशु चिकित्सकों का शान्तिरक्षक दल, मवेशियों का स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद कर रहा है.
हाल ही में, बोर इलाक़े में यूएन शान्तिरक्षकों ने एक चिकित्सा शिविर में अनेक मवेशियों का इलाज किया और पशुपालकों को मदद दी. इनमें स्थानीय पशुपालक थोन चोल अगुतो भी हैं, जिनकी गाय पर एक मगरमच्छ ने हमला कर दिया था.
उन्होंने बताया कि, “गाय के घाव इतने ख़राब थे कि मेरे परिवार और मित्रों ने उसे कसाई के पास ले जाने की सलाह दी. लेकिन मेरा मन अपनी गाय को इस स्थिति में छोड़ने का नहीं हुआ.” इसके बाद, पशु चिकित्सकों ने अपने शिविर में घायल गाय की सर्जरी व निशुल्क उपचार किया और पशुचारा भी मुहैया कराया, जिससे वह गाय ठीक होने के बाद फिर से चलने लगी है.
महिला पशुपालकों के लिए यह मदद विशेष रूप से मायने रखती हैं, जिन्हें अपने बच्चों के साथ-साथ मवेशियों की देखभाल की ज़िम्मेदारियों को भी निभाना पड़ता है. महिला पशुपालक योम अलियर गरांग को एक समय महसूस हुआ कि उनकी गाय की आँखों की रौशनी जा रही थी.
“मुझे लगा कि वह हमेशा के लिए अपनी नेत्र शक्ति खो देगी और हमारे परिवार के अन्य मवेशियों के साथ नहीं चल पाएगी. लेकिन मैं शान्तिरक्षक मित्रों की आभारी हूँ कि वह अब फिर से देख सकती हैं.”
यूएन शान्तिरक्षक पशु चिकित्सा मुहैया कराने के साथ-साथ उन पशुपालकों को प्रशिक्षण व सलाह भी प्रदान करते हैं, जिनकी इस जानकारी को हासिल करने में दिलचस्पी है.
बोर काउंटी के पशु चिकित्सा विभाग के उप निदेशक अब्राहम अलियर ने बताया कि यह सहयोग लगभग 20 वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब स्थानीय चिकित्साकर्मियों ने शान्तिरक्षकों के साथ काम करना शुरू किया.
इससे उन्हें पशुओं को होने वाली बीमारियों को समझने के साथ-साथ, उन संक्रमणों के बारे में भी जानकारी मिली, जो पशुओं से मनुष्यों में फैल सकते हैं. उप निदेशक अलियर ने स्वयं कुछ वर्ष पहले, पशु देखभाल और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच सम्बन्ध पर भारत के एक पशु चिकित्सा अस्पताल में ट्रेनिंग हासिल की थी.
लेफ़्टिनेंट कर्नल हरमनजीत सिंह गोराया, भारतीय बटालियन के साथ एक पशु चिकित्सा अधिकारी के रूप में तैनात हैं. उन्होंने बताया कि अपनी टीम के साथ मिलकर पशु धन की देखभाल के ज़रिए स्थानीय समुदायों के जीवन में बदलाव लाने का अवसर उन्हें प्रोत्साहित करता है.
“हमारे लिए, इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल पशु चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने तक सीमित नहीं है. पशुओं की सुरक्षित देखरेख और उनके स्वास्थ्य की देखभाल के बारे में समुदायों को जागरुक बनाकर, हम उनके अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी योगदान देते हैं.”
किसी बीमार पशु का स्वस्थ हो जाना. किसी घायल गाय की जान बच जाना. जिन समुदायों में पशुपालन आजीविका का एक प्रमुख साधन है, वहाँ इन कार्यों के लिए मदद सार्थक बदलाव का स्रोत साबित हो सकती है.
साथ ही, यह पशुपालकों को भी यह सीखने का अवसर मुहैया कराती है कि अपने मवेशियों की देखभाल के साथ अपने परिवार को भी किस तरह से सुरक्षित रखा जाए.
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