विस्थापन ने उनकी ज़िन्दगी तो बदली, मगर सपने नहीं. भारत में युवा शरणार्थी महिलाएँ शिक्षा, हुनर और अनुभवों के सहारे अपना भविष्य सँवारते हुए दूसरों के लिए भी नए अवसर बना रही हैं. यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) और उसके साझीदार संगठनों का सहयोग उन्हें सीखने, आजीविका कमाने और अपने समुदायों की अगुवाई करने के लिए नई राहें दे रहा है.
भारत में UNHCR के साथ 48 हज़ार से अधिक शरणार्थी और शरण चाहने वाले लोग पंजीकृत हैं. इनमें 18 से 24 वर्ष के 8,881 युवा शामिल हैं, जो कुल पंजीकृत आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हैं. सबसे बड़ी आबादी म्याँमार और अफ़ग़ानिस्तान से है.
उच्च शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोज़गार तक पहुँच अब भी कई युवाओं के लिए कठिन है. आर्थिक तंगी, दस्तावेज़ों की कमी, भाषा सम्बन्धी बाधाएँ और विस्थापन से जुड़ी चुनौतियाँ उनके रास्ते में आती हैं.
फिर भी, अनेक युवजन अपनी मुश्किलों को पार करते हुए दूसरों के लिए भी अवसर और सहारा बना रहे हैं.
2026 में UNHCR के भारत कार्यालय ने डिजिटल उच्च शिक्षा पहल (DHE) शुरू की, जिसके तहत शरणार्थी और शरण चाहने वाले छात्रों को डिजिटल सुविधाएँ, शैक्षणिक सहयोग और उच्च शिक्षा के अवसर मिलते हैं. अब तक 699 युवा शरणार्थी छात्रों को इससे सहायता मिली है.
आजीविका कार्यक्रम भी युवजन को कौशल, रोज़गार और आय के अवसरों से जोड़ रहे हैं. 2023 से अब तक 18 से 24 वर्ष के एक हज़ार से अधिक युवाओं को सहायता मिली है, जिनमें इस वर्ष के 226 युवजन भी शामिल हैं.
इस सहायता में व्यावसायिक प्रशिक्षण, रोज़गार और छोटे व्यवसायों के लिए सहयोग शामिल है, जिनमें IT, चिकित्सा व पैरामेडिकल सेवाएँ, सौन्दर्य व वेलनेस, डिजिटल मार्केटिंग, बेकरी एवं पाक-कला जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
अफ़ग़ान शरणार्थी और मनोविज्ञान की छात्रा ज़हरा के लिए संस्कृति, अपनेपन और आत्मविश्वास का सहारा है.
अल्बर्ट आइंस्टीन जर्मन अकादमिक शरणार्थी पहल (DAFI) छात्रवृत्ति पाने वाली ज़हरा, साँस्कृतिक कार्यक्रमों और रचनात्मक कार्यशालाओं के ज़रिए महिलाओं व युवजन को एक साथ लाती हैं. इस कार्यक्रम के ज़रिए शरणार्थी छात्रों को फ़ीस, अध्ययन सामग्री, जीवन-व्यापन और कौशल विकास में मदद मिलती है.
वह डारी, हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनुवाद भी करती हैं, ताकि शरणार्थी परिवारों को भाषा की बाधाओं के बावजूद ज़रूरी सेवाओं तक पहुँचाया जा सके.
ज़हरा आगे चलकर एक मनोवैज्ञानिक बनना चाहती हैं और शिक्षा व सामुदायिक पहलों के ज़रिए शरणार्थी युवाओं एवं महिलाओं का समर्थन जारी रखना चाहती हैं.
2003 से अब तक, भारत में 305 शरणार्थी छात्रों को DAFI का समर्थन मिला है, जिनमें 2026 के 23 छात्र भी हैं.
तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में श्रीलंकाई शरणार्थी और फिज़ियोथेरैपी की छात्रा दिशातना ने संगीत को अपने सपनों की राह बनाया.
शरणार्थी शिविर में पली-बढ़ीं दिशातना ने पढ़ाई के साथ संगीत जारी रखा और प्रस्तुतियों से हुई कमाई से गायन सीखा.
कई वर्षों की मेहनत के बाद उन्होंने टीवी के मशहूर Super Singer कार्यक्रम में जगह बनाई. अब वह उभरते गायकों का मार्गदर्शन करती हैं और चार छात्रों को नाममात्र शुल्क पर प्रशिक्षण दे चुकी हैं.
उन्होंने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि, “मेरी यात्रा दिखाती है कि शरणार्थी होना आपको सपने देखने से नहीं रोकता.”
वह स्वास्थ्य सेवा और संगीत, दोनों में अपना भविष्य बनाना चाहती हैं और अन्य युवा शरणार्थियों को भी अपने सपने पाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.
रोहिंग्या शरणार्थी नूर जहाँ के लिए शिक्षा “भविष्य की चाबी” है.
भाषा की बाधाओं और नए समुदाय में जीवन बसाने की चुनौतियों से उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई. 2024 में DAFI छात्रवृत्ति मिलने के बाद वह स्नातक की पढ़ाई जारी रख सकीं और सामुदायिक कार्यों में भी सक्रिय हुईं.
अपनी DAFI सामाजिक परियोजना के ज़रिए नूर, किशोरियों और महिलाओं के लिए माहवारी स्वच्छता एवं महिला स्वास्थ्य पर जागरूकता सत्र आयोजित करती हैं, ताकि वे इन विषयों पर खुलकर बात कर सकें.
वह रोहिंग्या बच्चों को अंग्रेज़ी और पढ़ाई में मदद करती हैं और परिवारों को ज़रूरी सेवाओं तक पहुँचने के लिए अनुवाद व दुभाषिया सहायता भी देती हैं.
नूर का लक्ष्य शरणार्थी बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर बढ़ाना और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य व सामुदायिक विकास तक पहुँच सुनिश्चित करना है.
म्याँमार के चिन समुदाय से आने वाली सुसान वैन ह्नेम पार ने स्वयं अनुभव किया है कि किस तरह हिंसक टकराव से बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है.
उन्होंने युद्ध में अपना घर खोने और शरणार्थी बच्चों की मुश्किलें देखने के बाद शिक्षक बनने का निर्णय लिया.
2023 से DAFI छात्रवृत्ति प्राप्त कर रहीं सुसान, मनोविज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं. साथ ही, दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षक और कार्यवाहक उप-प्रधानाचार्य हैं.
वह कई कक्षाओं और विषयों को पढ़ाती हैं और छोटे बच्चों को अतिरिक्त पढ़ाई में भी मदद देती हैं.
सुसान विशेषकर लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता देने के लिए परिवारों को प्रोत्साहित करती हैं. उनके लिए पढ़ाना केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास और अपनी क्षमता पर भरोसा जगाने का ज़रिया है.
रोहिंग्या शरणार्थी सादिया के लिए शिक्षा, सामाजिक बाधाओं को पार करने और अन्य लोगों की मदद का ज़रिया बनी. कम उम्र में शादी के दबाव के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और सामुदायिक काम भी करती रहीं.
महिलाओं को भाषा की बाधाओं और स्वास्थ्य आपात स्थितियों से जूझते देखकर, सादिया ने मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में उनकी मदद शुरू की.
वह अब तक 50 से अधिक शरणार्थी महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के दौरान अस्पताल में अनुवाद सहायता व अन्य प्रकार की सहायता दे चुकी हैं.
उन्होंने कहा, “मैं उन्हें केवल इसलिए संघर्ष करते नहीं देख सकती थी क्योंकि वे अपनी बात समझा नहीं पा रही थीं.”
एक परामर्शदाता और स्वास्थ्य स्वयंसेवक के रूप में, सादिया अब 100 महिलाओं को प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल के बारे में जागरूक कर चुकी हैं तथा परिवारों को भावनात्मक सहायता भी देती हैं.
रोहिंग्या शरणार्थी मिज़ान को बचपन से ही क्रोशिया का शौक़ रहा है, जो अब उनकी आजीविका का साधन बन चुका है.
उन्होंने यूएन शरणार्थी संगठन और उसके साझीदारों के सहयोग से डिज़ाइन, उत्पाद विकास और डिजिटल मार्केटिंग में कौशल बढ़ाया और “Fibre Art” नाम की एक छोटी आजीविका पहल शुरू की.
जो कभी शौक़ था, वह अब आय और आत्मविश्वास का ज़रिया है.
मिज़ान अब शरणार्थी व स्थानीय समुदायों की महिलाओं को क्रोशिया और फ़ाइबर कला सिखाती हैं, ताकि वे भी नए कौशल सीखकर आजीविका के अवसर बना सकें.
उनका यह प्रयास सीखने-सिखाने, सहयोग और समुदायों के बीच जुड़ाव को भी बढ़ावा दे रहा है.
युवा शरणार्थियों की आत्मनिर्भरता के लिए शिक्षा और कौशल विकास अहम हैं.
ज़हरा, दिशातना, नूर, सुसान, सादिया और मिज़ान की कहानियाँ दिखाती हैं कि सही अवसर मिलने पर युवा शरणार्थी न केवल अपना भविष्य सँवारते हैं, बल्कि अपने समुदायों को भी अधिक मज़बूत एवं समावेशी बनाते हैं.