आर्मीनिया की राजधानी येरेवान में सोमवार को जैवविविधता संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (COP17) आरम्भ हुआ है, जहाँ प्रकृति के विध्वंस को रोकने और वन्यजीवन को बचाने के उपायों पर चर्चा होगी. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि 10 लाख से अधिक प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का जोखिम है, प्रकृति को पहुँच रहे नुक़सान से करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है. उनका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि संरक्षण उपायों को कितनी तेज़ी से अमल में लाया जाता है.
जैवविविधता का अर्थ, पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवन और उनके प्राकृतिक परिवेश में विविधता से है. जैसेकि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया, अन्य सूक्ष्मजीव, वन, नदियाँ, घास के मैदान, रेगिस्तान, भोजन के अलग-अलग प्रकार.
19 से 30 अक्टूबर तक येरेवान में चलने वाले इस सम्मेलन, वर्ष 2022 में अपनाए गए 'कुनमिंग-मॉन्ट्रियल जैवविविधता फ़्रेमवर्क' के तहत प्रकृति के बचाव की दिशा में अब तक हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी और संरक्षण प्रयासों में तेज़ी लाने पर चर्चा होगी.
इस फ़्रेमवर्क का सबसे अहम लक्ष्य ‘30 by 30’ है, जिसमें वर्ष 2030 तक पृथ्वी के कम से कम 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण किया जाना है. यही संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करने की समयसीमा भी है.
इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और आक्रामक प्रजातियों (invasive species) जैसी चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ संरक्षण के लिए धन जुटाने तथा पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली आर्थिक नीतियों में सुधार पर भी ज़ोर दिया गया है.
जैवविविधता कन्वेंशन पर संयुक्त राष्ट्र की कार्यकारी सचिव एस्ट्रिड शोमेकर ने सोमवार को प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि, “वर्ष 2022 में 196 देशों ने प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लिया था. हम एक-दूसरे के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी जवाबदेह हैं."
"जैवविविधता के क्षरण से अरबों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है. ऐसे में अगले दो सप्ताह में येरेवान में लिए जाने वाले निर्णय उनके भविष्य के लिए बेहद अहम हैं.”
एस्ट्रिड शोमेकर ने कहा कि प्रकृति संरक्षण के प्रयासों से सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं, लेकिन इनमें आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों, महिलाओं और युवजन के अनुभवों व नए विचारों को शामिल करना भी ज़रूरी है.
“हमें शहरों, व्यवसायों और वित्तीय संस्थानों की भी अधिक भागेदारी चाहिए. वैज्ञानिक प्रमाण स्पष्ट हैं कि कोई भी देश, अर्थव्यवस्था या समाज जैव विविधता के क्षरण के प्रभावों से अछूता नहीं है.”
एस्ट्रिड शोमेकर ने कहा कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देशों को अपनी योजनाएँ वैश्विक संकल्पों के अनुरूप बनानी होंगी, पर्याप्त धन जुटाना होगा और उत्पादन व उपभोग के ऐसे तरीक़े अपनाने होंगे, जिनसे पृथ्वी के सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम हो.
संयुक्त राष्ट्र में आर्मिनिया के स्थाई प्रतिनिधि परुयर होवहानिस्यान के अनुसार, जैवविविधता पर कॉप17 सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के वादों को ज़मीन पर ठोस नतीजों में बदलना है.
उन्होंने यूएन न्यूज़ से कहा, “हम चाहते हैं कि कॉप17 से यह स्पष्ट सन्देश जाए कि जैवविविधता के क्षरण को रोकने के लिए सरकारों, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा.” इसके लिए योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना, पर्याप्त धन जुटाना और प्रगति की निगरानी के साथ जवाबदेही सुनिश्चित करना ज़रूरी है.
सम्मेलन में मुख्य रूप से इन छह मुद्दों पर चर्चा होगी:
इससे पहले, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शुक्रवार को येरेवान में आगाह किया था कि दुनिया भर में 10 लाख से अधिक प्रजातियों पर विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने प्रकृति के विरुद्ध युद्ध समाप्त करने का आहवान करते हुए सरकारों, व्यवसायों और समुदायों से जैवविविधता के संरक्षण के प्रयास तेज़ करने की अपील की थी.
“मानवता हर दिन जीवन रूपी वृक्ष की एक और शाखा काट रही है. जलवायु संकट, बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ, ज़रूरत से ज़्यादा चराई और मछलियों का शिकार, उर्वरकों, कीटनाशकों, प्लास्टिक व भारी धातुओं का अत्यधिक इस्तेमाल – ये सब प्रदूषण, जैव विविधता के क्षरण एवं जलवायु परिवर्तन के तिहरे संकट को बढ़ा रहे हैं.”
महासचिव ने चेतावनी दी कि दुनिया तेज़ी से ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही है, जहाँ जीवन जीना मुश्किल हो सकता है.
उन्होंने जैवविविधता फ़्रेमवर्क के तहत हुई सकारात्मक प्रगति का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इस समझौते के बाद, 2022 से अब तक, दुनिया भर में 13 लाख वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त भूमि और 60 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्रों को औपचारिक संरक्षण मिला है.
लेकिन उन्होंने आगाह किया कि “प्रगति असमान और बेहद धीमी है.” यदि प्रयास तेज़ नहीं हुए, तो वर्ष 2030 तक पृथ्वी के 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है.