इस बार कहानी कहने में अभिषेक पाठक ने थोड़ी जल्दबाजी कर दी है। अपने अंत तक पहुंचने में विजय काफी भागता हुआ नजर आता है। फिल्म ने 'फैमिली मैन' विजय को लगभग पूरी तरह से साइड कर दिया है। फिल्म के पहले हिस्से में श्रिया सरन और विजय की दोनों बेटियों (इशिता दत्ता और मृणाल जाधव) को बेहद कम स्क्रीन स्पेस और डायलॉग मिले हैं। यही बात कहानी को कमजोर करती है। ओरिजिनल 'दृश्यम' को इतना असरदार उसके परिवार ने बनाया था। विजय सिर्फ पुलिस को चकमा देने वाला आदमी नहीं था, वह एक ऐसा पति और पिता भी था जो अपने परिवार की हर तरह से सुरक्षा करता है। उसकी आम और प्यारी छोटी सी दुनिया ने ही उसके असाधारण कामों को और भी ज्यादा दिलचस्प बना दिया था। इस बार फिल्म सिर्फ विजय पर फोकस करती है। कहीं न कही जितनी जरूरत नहीं थी उससे ज्यादा तनाव के माहौल को क्रिएट किया गया है। मोटामोटी कहें तो फिल्म इससे बेहतरीन फेयलवेल डिजर्व करती थी।