उन्होंने बड़े कॉन्ट्रैक्ट साइज को भी एक वजह बताया। इससे फ्यूचर्स ट्रेडिंग और ऑप्शंस सेलिंग के लिए अब ज्यादा मार्जिन की जरूरत पड़ती है। उन्होंने कहा कि ऑप्शंस खरीदने के लिए प्रीमियम चुकाना पड़ता है, जिससे शुरुआत में कम पूंजी की जरूरत पड़ती है। खरीदे गए ऑप्शंस पर उतना ही लॉस होगा, जितना प्रीमियम चुकाया गया है। लेकिन, निश्चित समय में बार-बार ऑप्शंस खरीदने से फ्यूचर्स में ट्रेडिंग या ऑप्शंस सेलिंग के मुकाबले ज्यादा लॉस हो सकता है।