इस चुनावी घटनाक्रम ने सोशल मीडिया की लोकप्रियता के वास्तविक मायनों पर बहस छेड़ दी है। हजारों-लाखों फॉलोअर्स किसी व्यक्ति की डिजिटल पहुंच तो दिखा सकते हैं। लेकिन वे अपने आप में चुनावी समर्थन की गारंटी नहीं होते। एक ओर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। वहीं दूसरी ओर गांव का मतदाता अपने प्रतिनिधि से स्थानीय विकास, सड़क, पानी, सफाई, एजुकेशन और दूसरी बुनियादी समस्याओं के समाधान की उम्मीद करता है।