AI, डिजिटल तकनीक और हरित ऊर्जा की बदौलत दुनिया तेज़ी से बदल रही है. तरक़्क़ी के नए रास्ते खुल रहे हैं, लेकिन क्या इनका फ़ायदा सबको मिल पाएगा? संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तकनीक, अर्थव्यवस्था व आबादी से जुड़े ये बड़े बदलाव सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बढ़ा सकते हैं, जिससे वंचित समुदायों के और पिछड़ने का ख़तरा है.
इन बदलावों का फ़ायदा उठाने के लिए अक्सर विशेष कौशल और नई तकनीकों तक पहुँच ज़रूरी होती है. ऐसे में वंचित समुदाय विकास की दौड़ में पिछड़ सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएँ, युवा, वृद्धजन, विकलांगजन, प्रवासी, आदिवासी समुदाय और कम आय वाले लोग विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं. इसी जोखिम को कम करने के लिए रिपोर्ट में सरकारों को ऐसे क़दम उठाने की सलाह दी गई है, जिनसे इन बदलावों का लाभ सभी तक पहुँच सके.
संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (DESA) द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सामाजिक समावेशन केवल नैतिक ज़िम्मेदारी ही नहीं, बल्कि आर्थिक ज़रूरत भी है.
वंचित समुदायों को अधिक अवसर देने से कार्यबल का विस्तार होता है, लोगों के कौशल बढ़ते हैं, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलता है तथा संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है. साथ ही, बढ़ती उत्पादकता का लाभ अधिक लोगों तक पहुँचता है.
रिपोर्ट के विमोचन पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने एक वीडियो सन्देश में कहा, “समावेशी समाज अधिक उत्पादक, सहनसक्षम और समृद्ध होते हैं.”
रिपोर्ट में सामाजिक समावेशन के लिए तत्काल क़दम उठाने पर ज़ोर दिया गया है, क्योंकि अवसरों और ज़रूरी सेवाओं से वंचित लोगों के लिए बाद में दूसरों के बराबर आना बहुत मुश्किल हो जाता है.
रिपोर्ट में सरकारों से आग्रह किया गया है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच केवल नए रोज़गार पैदा करने पर ही ध्यान न दें. उन कामगारों के प्रशिक्षण में भी निवेश करें, जिनका कामकाज ख़त्म हो सकता है या जिनके काम का स्वरूप बदल सकता है.
इसी तरह, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के दौरान जीवाश्म ईंधन पर निर्भर कामगारों और समुदायों को नए कौशल का प्रशिक्षण, वैकल्पिक रोज़गार एवं सामाजिक सहायता देने पर ज़ोर दिया गया है.
डिजिटल खाई पाटने के लिए, विशेष रूप से वंचित समुदायों में सस्ती इंटरनेट सेवाओं, डिजिटल सुविधाओं और तकनीकी प्रशिक्षण का विस्तार करने की सिफ़ारिश की गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक प्रगति को केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से नहीं, बल्कि ग़रीबी में कमी, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, रोज़गार की सुरक्षा, असमानता और पर्यावरण संरक्षण के आधार पर भी आँकना चाहिए.
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस आर्थिक विकास का लाभ आबादी के केवल एक छोटे हिस्से तक पहुँचे, उसे वास्तव में समावेशी नहीं कहा जा सकता.
इन उपायों को लागू करने के लिए धन की ज़रूरत है, लेकिन अनेक विकासशील देश आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. इससे ज़रूरी बदलावों की राह में मुश्किलें आ सकती हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने चेतावनी दी कि दुनिया के लगभग आधे सबसे निर्धन देश क़र्ज़ संकट में हैं या उसके गम्भीर जोखिम का सामना कर रहे हैं. आय के अनुपात में ब्याज़ का बोझ पिछले कई दशकों के सबसे ऊँचे स्तर पर है.
महासचिव ने विश्व नेताओं से सामाजिक विकास पर दोहा राजनैतिक घोषणापत्र और विकास के लिए वित्तपोषण पर सेविया प्रतिबद्धता के तहत किए गए वादे पूरे करने का आग्रह किया.
उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार की भी अपील की, ताकि विकासशील देशों को बेहतर प्रतिनिधित्व और सहयोग मिल सके.
महासचिव ने कहा, “बदलाव होना तय है, लेकिन असमानता और लोगों का पीछे छूटना नहीं.”
उन्होंने अपील की, “आइए, मिलकर सुनिश्चित करें कि दुनिया में हो रहे ये बड़े बदलाव ऐसे समाजों के निर्माण में मदद करें, जहाँ सभी को न्याय, सम्मान और आगे बढ़ने के अवसर मिलें.”