जैवविविधता, पृथ्वी पर जीवन को पोषित करती है और हमारे ग्रह को सेहतमन्द बनाए रखने, अर्थव्यवस्था की मज़बूती देने व लोगों की भलाई के लिए इसकी रक्षा की जानी अत्यंत ज़रूरी है. मगर, विश्व भर में पौधों, जीवों व पारिस्थितिकी तंत्रों को बचाने के इस संघर्ष में दुनिया फ़िलहाल पिछड़ती नज़र आ रही है.
आर्मिनिया की राजधानी येरेवान में सम्बद्ध पक्षों के जैवविविधता सम्मेलन (कॉप17) से ठीक पहले, संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि दुनिया, जैवविविधता संरक्षण के लिए निर्धारित लक्ष्यों में से 50 फ़ीसदी से भी कम को हासिल करने की ओर बढ़ रही है.
पर्यावरण को अब तक पहुँची क्षति पर मरहम लगाने और प्रकृति की रक्षा करने के लिए ये लक्ष्य ‘कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधिता फ़्रेमवर्क’ नामक समझौते में वर्ष 2022 में तय किए गए थे.
जैसेकि विश्व भर में कुल भूमि, अन्तर्देशीय जल (inland water), तटीय इलाक़ों और महासागरों के कम से कम 30 फ़ीसदी हिस्से का संरक्षण सुनिश्चित करना.
इस समझौते का उद्देश्य 2050 तक प्रकृति के साथ समरसतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है, जिसके लिए, 2030 तक तत्काल क़दम भी उठाए जाने हैं. लेकिन बुधवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया इस दौड़ में पिछड़ रही है.
जैविक विविधता या जैवविविधता से तात्पर्य, पृथ्वी पर विविधतापूर्ण जीवन की उपस्थिति से है. अपने सभी रूपों में: वंशाणुओं (genes) व बैक्टीरिया, कीड़ों, पशुओं, पौधों से लेकर पारस्थितिकी तंत्रों, जैसेकि वनों और प्रवाल भित्तियों (coral reefs) तक.
हम आज जिस जैवविविधता को देखते हैं, वह 4.5 अरब वर्ष के विकास क्रम का परिणाम है, और यह हमारे भोजन, जल, औषधि, जलवायु स्थिरता, आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है.
मगर इस पर मानवीय गतिविधियों का असर बढ़ता गया है, और अनेक प्रजातियों के लुप्त होने का ख़तरा बढ़ रहा है, जिसके लिए भूमि व समुद्र के इस्तेमाल के तौर-तरीक़ों में बदलाव, जलवायु परिवर्तन प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, जैसे कारणों को माना गया है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा है कि जैविक विविधता की रक्षा करना, हमारी पृथ्वी के स्वास्थ्य, हमारी अर्थव्यवस्थाओं की सुदृढ़ता और हमारे लोगों की भलाई के लिए बहुत आवश्यक है.
मगर, फ़िलहाल जिस रफ़्तार से प्रगति दर्ज की जा रही है, उसके अनुसार, 2030 तक भूमि के केवल 26 फ़ीसदी हिस्से और महासागर के 12 प्रतिशत हिस्से का संरक्षण कर पाना ही सम्भव होगा.
रिपोर्ट में अनेक मोर्चों पर पेश आने वाली कठिनाइयों को चिन्हित किया गया है: वित्तीय संसाधन, कौशल, सहयोग, डेटा की उपलब्धता, और प्रकृति को नष्ट करने के बजाय उनकी रक्षा के लिए आर्थिक प्रोत्साहन उपायों का अभाव.
“बुरी ख़बर यह है कि प्रकृति के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध का अभी अन्त नहीं हुआ है.”
यूएन प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि दुनिया, आपस में गुंथे हुए तीन संकटों से जूझ रही है: जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता हानि, और प्रदूषण.
महासचिव गुटेरेश के अनुसार, वर्ष 2022 के बाद से जैवविविधता संरक्षण के मोर्चे पर कुछ प्रगति देखने को मिली है.
जैविक विविधता सन्धि में शामिल लगभग 90 फ़ीसदी देशों ने इस दिशा में अपने राष्ट्रीय लक्ष्य तय किए हैं. 50 फ़ीसदी से अधिक ने इन्हें पूरा करने के लिए स्वयं अपनी योजनाएँ तैयार की हैं.
आदिवासी लोगों, स्थानीय समुदायों, क्षेत्रीय व शहरी एजेंसियों, परोपकारी संगठनों और व्यसायों ने भी पाँच हज़ार से अधिक संकल्प व्यक्त किए हैं. हालांकि रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि महत्वाकाँक्षा और ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई में फ़िलहाल एक बड़ी खाई है.
विकासशील देशों में इस अन्तर को दूर करने के धनराशि व विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी. साथ ही, देशों की सरकारों को ऐसे क़दम उठाने होंगे, जिससे प्रकृति को नुक़सान पहुँचाने वाली सब्सिडी पर रोक लगे, सामाजिक सुरक्षा उपायों को मज़बूती मिले और प्रकृति की रक्षा के लिए धन आवंटित किया जाए.