बताया जा रहा है कि ‘गांव चलो आंदोलन’ है एक कैंपेन है जो वर्कर्स को लंबे समय तक काम करने, साप्ताहिक अवकाश न मिलने, सैलरी में कटौती और नौकरी से निकाले जाने के आरोपों के बीच अपने गांवों में लौटने को बढ़ावा दे रही है। सीएनएन न्यूज 18 की खबर के मुताबिक मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्कर्स उन काम करने के हालात को मानने को तैयार नहीं हैं जिन्हें वे सही नहीं मानते हैं। हालांकि, सूरत से मिली दूसरी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई वर्कर्स दिवाली और छठ पूजा से पहले बस घर जा रहे हैं, जैसा कि वे हर साल करते हैं। तो, सूरत में असल में क्या हो रहा है? क्या माइग्रेंट वर्कर्स को गुजरात से बाहर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, या यह रेगुलर सीजनल माइग्रेशन बढ़ते लेबर विवाद के साथ हुआ है?