भारत के विदेश मंत्री सुब्रहमण्यम जयशंकर ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के नौवें दशक में भी हिंसक टकराव और संघर्ष हमारी मुख्य चिन्ता बने हुए हैं, जिससे अन्तरराष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा दरक रही है और रणभूमि से दूर देशों को इसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को यूएन महासभा के 81वें सत्र को सम्बोधित करते हुए कहा कि “शान्ति बरक़रार रखने में असमर्थता की वजह से न केवल सुरक्षा कमज़ोर हो रही है, बल्कि यह प्रगति के लिए ख़तरा है जोकि एक वैश्वीकृत दुनिया में विकास की गति को धीमा कर रही है.“
उन्होंने कहा कि हिंसक टकरावों से दूर स्थित देश भी इसकी क़ीमत चुका रहे हैं, जबकि इसमें उनकी कोई ग़लती भी नहीं है.
भारतीय विदेश मंत्री ने खाड़ी क्षेत्र में टकराव जारी रहने, लाल सागर से लेकर काला सागर तक अन्तरराष्ट्रीय जलमार्गों पर कमर्शियल जहाज़ों व समुद्री नाविकों को निशाना बनाए जाने को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया.
उन्होंने पश्चिमी एशिया और मध्य पूर्व में तनाव व टकराव के अन्त पर बल देते हुए कहा कि स्थाई शान्ति के लिए दो-राष्ट्र समाधान आवश्यक है. सभी पक्षों को संयम बरतना होगा, तनाव में कमी लानी होगी, आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी और ऊर्जा व वाणिज्य के बेरोकटोक प्रवाह को जारी रखना होगा.
उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध भी उतना ही चिन्ताजनक है, जोकि अब अपने पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के कथन को दोहराते हुए कहा कि अन्तहीन युद्ध से अब युद्ध के अन्त तक बढ़ा जाना होगा, और भारत शान्ति प्रयासों के लिए सभी पहल का समर्थन करता है.
भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि यदि दुनिया को निरन्तर धमकियों और दबावों की ओर धकेला जाता है, तो हम वास्तव में रसातल के कगार पर जी रहे हैं. इसलिए स्थिरता, सुरक्षा व अनुमान लगाने की क्षमता को मज़बूती देना अनिवार्य है, जोकि शान्ति के लिए माहौल तैयार करने के अहम घटक हैं.
उनके अनुसार, यूएन की स्थापना के आठ दशकों के बाद यह स्वाभाविक प्रवृत्ति बन जानी चाहिए थी, लेकिन हम हर चीज़ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल में लाए जाने की परिस्थिति को देख रहे हैं.
वित्तीय जगत से लेकर बाज़ार तक पहुँच को सीमित करने, आपूर्ति चेन में व्यवधान पैदा करने और टैक्नॉलॉजी को रोकने तक, हम “अत्यधिक प्रतिस्पर्धा” की मानसिकता को देख रहे हैं. संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं और अवरोध बिन्दु (choke points) स्थापित किए जा रहे हैं.
“यही वजह है कि देश अब जोखिम कम करने और विविधीकरण पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं,” मगर यह माहौल विश्वास या सदभावना वाला नहीं रह गया है.
विदेश मंत्री ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्तीय संसाधनों का संकट है, जिनसे वैश्विक दक्षिण में स्थित देशों के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हुई है. ऐल नीन्यो जलवायु प्रभावों के कारण उर्वरक की क़िल्लत है और अनाज की आवाजाही बाधित होने से चिन्ता गहरी हुई है, टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति पर दबाव है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार, आतंकवाद, शान्ति के लिए निरन्तर एक अभिशाप रहा है, और यदि सीमा-पार उद्देश्यों के लिए यह किसी देश द्वारा प्रायोजित हो, तो यह वैश्विक व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती बन जाता है.
“ऐसी गतिविधियों में लिप्त सरकारों की जवाबदेही तय की जानी होगी. आतंकवाद पर हमारे शून्य-सहिष्णुता दृष्टिकोण में कोई ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए.”
भारतीय नेता ने कहा कि शुक्रवार को जनरल डिबेट के दौरान आतंकवाद का सिलसिलेवार ढंग से सहारा लेने वाले एक पक्ष ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और आतंकवाद के सामान्यीकरण की कोशिश की.
उन्होंने कहा कि “यह स्वीकार्य नहीं होगा,” और आतंकवाद के ज़िम्मेदारों को अपने रास्ते बदलने होंगे. “हम आतंकवाद के विरुद्ध अपनी रक्षा करने के अधिकार को इस्तेमाल करेंगे. आतंकवाद के साथ मित्रता और सदभावना का सहअस्तित्व नहीं है.”
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत के समावेशी विकास और सर्वांगीण प्रगति ने मानवता के छठे हिस्से की प्रगति को आगे बढ़ाया है. जब स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा ज़रूरतों को पूरा किया जाता है, जब पेयजल, बिजली, सड़क और आवास को सुनिश्चित किया जाता है, तो यह वैश्विक एसडीजी [टिकाऊ विकास लक्ष्यों] को हासिल करने में मदद करता है.
“हमारे डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे के ज़रिए न केवल बेहतर शासन व्यवस्था को सुनिश्चित किया गया है, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक लाभ को वितरित करने की बुनियाद भी बना है.”
एस. जयशंकर ने कहा कि भारत अपनी प्रगति के साथ-साथ वैश्विक दायित्वों के प्रति भी सचेत है, और ग्लोबल साउथ के साथ गहरी एकजुटता ने अनुभवों व उपलब्धियों को साझा करने के लिए प्रेरित किया है. भारत ने 78 देशों में 600 विकास परियोजनाओं को अपना समर्थन दिया, जोकि स्वच्छ ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे, टिकाऊ कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों पर केन्द्रित हैं.
उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की भावना के साथ भारत, शान्ति स्थापना में योगदान देने के लिए तत्पर है और यूएन शान्तिरक्षा अभियानों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने कहा कि फ़िलहाल दुनिया भर में, यूएन शान्तिरक्षा मिशन के लिए 11 में से 9 अधिदेशों (mandates) में हमारे दस्ते उपस्थित हैं.
उन्होंने कहा कि वर्तमान में कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) वैश्विक चर्चा के केन्द्र में है. भारत ने फ़रवरी में एआई इम्पैक्ट समिट का आयोजन किया था. एआई मानव सशक्तिकरण, आर्थिक समृद्धि और समस्याओं के निराकरण में अहम भूमिका निभा सकती है.
"हम हर एक राष्ट्र के इस अधिकार में विश्वास रखते हैं कि अपने पारिस्थितिकी तंत्र को अपने मॉडल व विकास रणनीतियों के तहत आकार दिया जाए, राष्ट्रीय लक्ष्यों व प्राथमिकताओं के अनुरूप. जैसे-जैसे टैक्नॉलॉजी का लोकतांत्रिकरण हो रहा है, इस प्रक्रिया को पारस्परिक सम्मान की भावना के साथ आगे बढ़ाना होगा."
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि दुनिया बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है और 1945 में विश्व युद्ध के बाद जिस व्यवस्था को स्थापित किया गया था, वह नई वास्तविकताओं को देख रही है.
“समायोजन, समांजस्य और स्वीकार्यता की यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी. हम आज जो उथलपुथल देख रहे हैं, उसकी बुनियादी इन्हीं कठिनाइयों में है.
भारतीय नेता ने कहा कि दुनिया स्वाभाविक रूप से विविधतापूर्ण है और अधिक लोकतांत्रिक भविष्य की ओर बढ़ते क़दमों को रोका नहीं जा सकता है.
उनके अनुसार, बहुलतावादी व्यवस्था में शान्ति के लिए सभ्य बातचीत आवश्यक है और मानवता के बड़े हिस्से को इस प्रक्रिया से दूर नहीं रखा जा सकता है.
उन्होंने यूएन परिसर में महात्मा गाँधी की मूर्ति पर अंकित शब्दों को इस दौर में प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि “शान्ति का कोई मार्ग नहीं है. शान्ति ही मार्ग है.”