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अंकुर वारिकू ने रिश्तों को समझाने के लिए फोन चार्जर की एक दिलचस्प मिसाल दी है। उनका कहना है कि जिस तरह हम किसी दूसरे का फोन चार्ज करने के चक्कर में अपनी बैटरी खत्म कर सकते हैं, वैसे ही रिश्तों में भी दूसरों को खुश रखने के लिए खुद को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन क्या यह सही है?