संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) के सहयोग से भारत सरकार का ‘जल जीवन मिशन’, देश के ग्रामीण इलाक़ों में स्थित घरों तक नल का पानी पहुँचाने और नियमित व सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करने में जुटा है. इससे उन लाखों-करोड़ों महिलाओं और लड़कियों को राहत मिल रही है, जिन्हें पहले पानी भरकर लाने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता था.
लाखों-करोड़ों परिवारों के लिए घर में नल से पानी की सुविधा मिलना एक बड़ी राहत है. इससे पानी भरकर लाने में लगने वाली उनकी मेहनत और समय बचता है, जिसे पढ़ाई, कामकाज और परिवार के साथ बिताया जा सकता है.
भारत सरकार ने अगस्त 2019 में 'जल जीवन मिशन' शुरू किया था, जिसका लक्ष्य हर ग्रामीण घर में नल के ज़रिए प्रति व्यक्ति रोज़ाना 55 लीटर सुरक्षित जल पहुँचाना है.
इस मिशन के तहत, यूनीसेफ़ तकनीकी सहायता मुहैया कराने, स्थानीय संस्थाओं को मज़बूत बनाने और समुदायों की भागेदारी बढ़ाने में सहयोग कर रहा है.
हाल के वर्षों में, भारत में ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुँचाने में बड़ी प्रगति हुई है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण घरों (16.7 फ़ीसदी) में नल के कनेक्शन थे. जुलाई 2026 तक यह संख्या बढ़कर 15.8 करोड़ (82.1 फ़ीसदी) पहुँच गई है.
यानि, सात वर्षों में 12.6 करोड़ अतिरिक्त घरों तक नल का पानी पहुँचा है. हालांकि, लगभग 3.47 करोड़ ग्रामीण घर-परिवाह अब भी इस सुविधा से वंचित हैं.
यूनीसेफ़ ने जल शक्ति मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ मिलकर जल आपूर्ति की योजना बनाने, अधिकारियों को प्रशिक्षित करने और गाँवों में जल प्रबन्धन समितियों को मज़बूत करने में सहयोग दिया है.
किसी घर में नल होने का यह अर्थ नहीं है कि उससे हर दिन पर्याप्त और सुरक्षित पानी भी मिलेगा. वर्ष 2024 में, भारत में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 84 फ़ीसदी घरों को तय समय पर और 80 फ़ीसदी को ज़रूरत के अनुसार जल की आपूर्ति हुई.
लेकिन जल की गुणवत्ता, मात्रा और नियमित आपूर्ति, तीनों को ध्यान में रखने पर 76 प्रतिशत नल कनेक्शन ही पूरी तरह कार्यशील पाए गए.
ये आँकड़े दर्शाते हैं कि नल लगाने के साथ-साथ, नियमित और सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है.
इसी उद्देश्य से, भारत सरकार ने मार्च 2026 में 'जल जीवन मिशन 2.0' को स्वीकृति दी और इसकी अवधि दिसम्बर 2028 तक के लिए बढ़ा दी. लगभग 91 अरब डॉलर के कुल बजट वाले इस नए चरण में जल की गुणवत्ता, नियमित आपूर्ति और जल प्रणालियों के रखरखाव पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है.
यदि जल का स्रोत ही सूख जाए, तो घर में लगा नल भी किसी काम का नहीं रह जाता.
बारिश के बदलते रुझान, भूजल के गिरते स्तर और चरम मौसम की घटनाओं (बाढ़, सूखा, तूफ़ान) से ग्रामीण इलाक़ों में जल आपूर्ति प्रभावित होने का ख़तरा बढ़ रहा है.
यूनीसेफ़, सरकारी एजेंसियों को इन जोखिमों की पहचान करने, और जल स्रोतों की सुरक्षा व जलवायु चुनौतियों का सामना करने में सहनसक्षम जल आपूर्ति प्रणालियाँ विकसित करने में सहयोग दे रहा है.
इसके तहत, रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जलवायु सम्बन्धी जोखिमों का आकलन किया गया है.
साथ ही, सौर ऊर्जा से चलने वाली जल आपूर्ति प्रणालियों और उनके बेहतर रखरखाव को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि लागत और पर्यावरण पर पड़ने वाला असर कम हो सके.
नियमित जल आपूर्ति के लिए पाइप और पम्प के साथ-साथ, उन्हें चलाने और उनकी देखभाल करने वाले प्रशिक्षित लोगों की भी ज़रूरत है.
इस दिशा में, यूनीसेफ़ द्वारा इंजीनियरों, पम्प संचालकों, स्थानीय कर्मचारियों और ग्राम प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण में सहयोग दिया जाता है, जिसके तहत, 172 प्रशिक्षण संस्थानों को मदद दी जा रही है.
उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में स्थानीय कर्मचारियों को जल आपूर्ति प्रणालियों के संचालन और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. यूनीसेफ़ के सहयोग से 154 जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं को मज़बूत बनाने और मान्यता दिलाना भी सम्भव हुआ है.
साथ ही, समुदायों की भागेदारी और डिजिटल निगरानी के ज़रिए जल की गुणवत्ता की जाँच की जाती है, ताकि दूषित पानी के ख़तरों का समय रहते पता लगाया जा सके और परिवारों को सुरक्षित पेयजल मिलता रहे.
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