संयुक्त राष्ट्र की कारगरता या बहुपक्षीय व्यवस्था व सहयोग से जुड़े सवाल नए नहीं हैं, मगर इसके बावजूद, संगठन ने अपने दौर की हर परीक्षा का सामना किया है, इसका कोई वास्तविक विकल्प नहीं है और यूएन के बजाय किसी अन्य व्यवस्था की कल्पना करना भी कठिन है. यूएन महासभा के 81वें सत्र के लिए अध्यक्ष ख़लीलुर रहमान ने मंगलवार को जनरल डिबेट के अवसर पर प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.
ख़लीलुर रहमान ने संयुक्त राष्ट्र की विफलताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि फ़लस्तीन सम्बन्धी प्रश्न को अब भी नहीं सुलझाया जा सका है. सूडान, ग़ाज़ा, यूक्रेन, म्याँमार, और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों में युद्ध जारी हैं.
मगर, कई अन्य मोर्चों पर संगठन को सफलताएँ भी मिली हैं: इराक़ में लगभग 50 लाख लोग अपने घर लौटे हैं, हेती में सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद सहायता वितरित की जा रही है और युद्ध से बदहाल देशों में यूएन शान्तिरक्षक सड़कों व समुदायों का निर्माण कर रहे हैं.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सार्वजनिक भरोसे को फिर से बहाल करने के लिए यह ज़रूरी है कि कठोर वास्तविकताओं को स्वीकार किया जाए और आवश्यकता अनुसार क़दम उठाए जाएं.
महासभा अध्यक्ष ने कहा कि भरोसे को दिया नहीं जाता है, बल्कि यह कमाया जाता है. उनके अनुसार, यूएन संगठन में विश्वास को फिर से बहाल करने के लिए यह ज़रूरी है कि:
महासभा प्रमुख ने सुरक्षा परिषद में सुधारों की पैरवी करते हुए न्यायसंगत प्रतिनिधित्व पर बल दिया. “जब सुरक्षा परिषद कारगर होती है, तो संयुक्त राष्ट्र कारगर होता है.”
उन्होंने कहा कि अफ़्रीकी महाद्वीप पर यूएन शान्तिरक्षा अभियानों की केन्द्रीय भूमिका के बावजूद, पिछले आठ दशकों से सुरक्षा परिषद में अफ़्रीका को स्थाई प्रतिनिधित्व हासिल नहीं है और उसके लिए यह भूमिका सुनिश्चित की जानी होगी.
ख़लीलुर रहमान ने कहा कि साल-दर-साल विकास सहायता में 23 प्रतिशत, 175 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है जबकि वैश्विक स्तर पर सैन्य ख़र्च अब 3 हज़ार अरब डॉलर के आँकड़े को छू रहा है, जोकि 11 वर्षों की निरन्तर वृद्धि को दर्शाता है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि इन विसंगतियों के बावजूद कई मोर्चों पर प्रगति हासिल की गई है:
महासभा प्रमुख ने आग्रह किया कि कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र को पिछड़ने से रोकना होगा.
उनके अनुसार, एआई टैक्नॉलॉजी अब विश्व भर में महत्वपूर्ण प्रणालियों का हिस्सा बन रही है और इससे पुख़्ता बचाव के लिए वैज्ञानिकों की सलाह के साथ भरोसेमन्द उपायों को अपनाया जाना होगा.
“हम एआई पर नियंत्रण के लिए हथियारों की होड़ को, हमें कगार तक धकेलने नहीं दे सकते हैं.”
वहीं, बढ़ती नफ़रत और घृणा भरे वृतान्त, घरों और देशों की सीमाओं के परे जाकर तेज़ी से फैल रहे हैं, जिनमें महिलाओं व लड़कियों, अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, शरणार्थियों, और विकलांगजन को निशाना बनाया जा रहा है, अक्सर राजनैतिक फ़ायदे के लिए.
इसके मद्देनज़र, उन्होंने संवाद, सहिष्णुता के साथ मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली संस्कृति को प्रोत्साहन देने का आग्रह किया. न केवल क़ानून में बल्कि आम दिनचर्या व एक-दूसरे के साथ होने वाली बातचीत में भी.
ख़लीलुर रहमान ने कहा कि नई उभरती टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल झूठ फैलाने, सार्वजनिक विमर्श को तोड़ने-मरोड़ने, नफ़रत फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने में किया जा रहा है. इससे निपटने के लिए यह ज़रूरी है कि हमारे दौर के उपायों का उपयोग भय को बढ़ावा देने में नहीं बल्कि मानव गरिमा व पारस्परिक समझ को आगे बढ़ाने के लिए किया जाए.