प्राइवेट इक्विटी और प्री-IPO निवेश से कंपनियों के लिस्टेड मार्केट में आने से पहले ही उनमें निवेश का मौका मिल सकता है, लेकिन इनमें कुछ खास जोखिम भी होते हैं। इनमें वैल्यूएशन को लेकर अनिश्चितता,कम लिक्विडिटी,निवेश को लंबे समय तक होल्ड करने की जरूरत और इस बात की संभावना शामिल है कि प्लान की गई लिस्टिंग में देरी हो सकती है। कभी-कभी तो लिस्टिंग ही नहीं हो पाती। ऐसे मामलों में निवेशकों को सिर्फ़ लिस्टिंग से होने वाले फायदे की उम्मीद पर निर्भर रहने के बजाय, कंपनी के फाइनेंशियल परफ़ॉर्मेंस, मैनेजमेंट की क्वालिटी, स्केलेबिलिटी और उसके वैल्यूएशन के पीछे की वजहों की भी जांच करनी चाहिए।