पिछले 15 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है जब दैनिक जीवन के अनेक मोर्चों पर निर्धनता से जूझ रही आबादी में वृद्धि दर्ज की गई है. विश्व भर में, भोजन, शिक्षा, स्वच्छ जल और बिजली जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की संख्या 1.2 अरब के आँकड़े को छू गई है.
यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय की 'बहुआयामी निर्धनता सूचकांक' (Multidimensional Poverty Index) पर आधारित नवीनतम रिपोर्ट में सामने आई है, जिसे सोमवार को जारी किया गया है.
इस सूचकांक को वर्ष 2010 में विकसित किया गया था, ताकि निर्धनता को केवल आय के आधार पर नहीं, बल्कि लोगों की बुनियादी ज़रूरतों, जैसेकि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के ज़रिए मापा जा सके और यह पता लगाया जाए कि आम लोग किस तरह से ग़रीबी का अनुभव कर रहे हैं.
इसके लिए अनेक संकेतकों का सहारा लिया जाता है. उदाहरण के लिए, पोषण, बाल मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा की अवधि, खाना पकाने के लिए ईंधन, साफ़-सफ़ाई, पेयजल, बिजली, आवास और सम्पत्ति.
यदि कोई व्यक्ति इन संकेतकों के आधार पर एक-तिहाई या उससे अधिक बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, तो उसे बहुआयामी निर्धनता में जीवन गुज़ार रहा माना जाता है.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 की तुलना में बहुआयामी निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों की संख्या 5.15 करोड़ बढ़कर, 1.2 अरब पर पहुँच गई है. इनमें आधे से अधिक, यानि 61.7 करोड़ बच्चे हैं, जबकि 83 फ़ीसदी लोग ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं.
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रशासक ऐलेक्ज़ेंडर डे क्रू ने बढ़ती निर्धनता पर चिन्ता जताते हुए कहा कि, “निर्धनता में वृद्धि दुनिया के लिए एक चेतावनी है…इन आँकड़ों के पीछे 1.2 अरब लोग हैं, जो भुखमरी, शिक्षा की कमी और स्वच्छ जल व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं. ये समस्याएँ एक-दूसरे को और गम्भीर बनाती हैं. यह अस्वीकार्य है.”
सब-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया क्षेत्र में स्थित देशों में ऐसी बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना कर रहे लोगों की संख्या सबसे अधिक है.
वर्ष 2026 की रिपोर्ट में 108 देशों के आँकड़े शामिल किए गए हैं, जहाँ विश्व की लगभग 78 फ़ीसदी आबादी रहती है.
रिपोर्ट के अनुसार, निर्धनता में वृद्धि की एक बड़ी वजह यह है कि आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, जबकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार अपेक्षाकृत धीमा है.
जिन 95 देशों में नए सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं थे, वहाँ जनसंख्या के संशोधित अनुमानों के कारण निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों की संख्या लगभग 1.6 करोड़ बढ़ी है.
बाक़ी वृद्धि उन 13 देशों में दर्ज की गई, जहाँ नए सर्वेक्षण हुए. इसमें निर्धनता और आबादी में बदलाव के साथ-साथ, सर्वेक्षण में इस्तेमाल किए गए कुछ संकेतकों में बदलाव की भी भूमिका रही.
हालाँकि, कुछ देशों में उत्साहजनक प्रगति भी हुई है. मिस्र, नेपाल, ताजिकिस्तान, अंगोला और ज़ाम्बिया में बहुआयामी निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों का अनुपात घटा है. लेकिन अंगोला और ज़ाम्बिया में तेज़ जनसंख्या वृद्धि के कारण ऐसे लोगों की कुल संख्या फिर भी बढ़ गई.
वहीं, नाइजीरिया में वर्ष 2010 से 2020 के बीच निर्धनता में कमी आई थी, लेकिन अब वहाँ निर्धनता से प्रभावित लोगों का अनुपात और कुल संख्या, दोनों बढ़ गए हैं.
अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत वर्ष 2030 तक निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों के अनुपात में कम से कम 50 फ़ीसदी की कमी लाने का संकल्प लिया है. यूएन विशेषज्ञों का मानना है कि यह लक्ष्य अब भी हासिल किया जा सकता है.
यूएन विकास कार्यक्रम के प्रशासक ऐलेक्ज़ेंडर डे क्रू ने कहा, “हम जानते हैं कि प्रगति सम्भव है. जिन देशों ने इन चुनौतियों का अलग-अलग समाधान करने के बजाय, मिलकर इनसे निपटने के प्रयास किए हैं, उन्होंने दिखाया है कि ठोस कार्रवाई से क्या-कुछ हासिल किया जा सकता है.”
33 देशों ने 15 वर्षों से भी कम समय में अपने बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (MPI) के मूल्य को आधा कर दिया है. इनमें सब-सहारा अफ़्रीका के छह देश भी शामिल हैं. ऐस्वातिनी में बहुआयामी निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों का अनुपात लगभग 39 फ़ीसदी से घटकर आठ फ़ीसदी रह गया है.
आँकड़ों के अनुसार, चीन ने सबसे तेज़ प्रगति दर्ज की, जहाँ वर्ष 2010 से 2014 के बीच, महज़ चार वर्षों में बहुआयामी निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों का अनुपात 9.5 फ़ीसदी से घटकर 4.2 फ़ीसदी रह गया.
यूएन विकास कार्यक्रम का कहना है कि इन देशों के अनुभव दिखाते हैं कि सही नीतियों और ठोस कार्रवाई से निर्धनता कम करना सम्भव है. ज़रूरत है कि इन प्रयासों को तेज़ किया जाए, ताकि अधिक लोगों तक प्रगति का लाभ पहुँच सके.