भारत के ग्रामीण इलाक़ों में शौचालय निर्माण का काम पारम्परिक रूप से पुरुषों के भरोसे रहा है, लेकिन इस व्यवस्था में कई समस्याएँ सामने आती हैं. अक्सर पुरुष मिस्त्री कामकाज के लिए अन्य स्थानों पर पलायन कर जाते हैं, जिससे काम या तो अधूरा छूट जाता है या फिर उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है. इसके विपरीत, विवाहित महिलाएँ आमतौर पर अपने गाँव में ही रहती हैं और यदि उन्हें सही प्रशिक्षण मिल जाए, तो वे एक भरोसेमन्द एवं स्थाई श्रमशक्ति बन सकती हैं. यह बात साबित भी हो रही है.