एक परिवार के एक ही सदस्य चुनाव लड़े, ऐसा कोई नियम कांग्रेस का नहीं था। पर यह संयम श्रीबाबू का था। राजनीति में श्रीबाबू का इतना अधिक प्रभाव था कि यदि वे चाहते थे, तो अपने बेटे को टिकट दिला देना उनके बांये हाथ का खेल था। लेकिन वे राजनीति में गरिमा कायम रखना चाहते थे। पूर्व मुख्यमंत्री भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर की कहानी श्रीबाबू से ही मिलती-जुलती है