दुनिया के कई कोनों में आज भी करोड़ों बच्चे ऐसे हैं जो सुबह की पहली किरण के साथ उठ तो जाते हैं, मगर स्कूलों में पढ़ने-लिखने के लिए नहीं, बल्कि खेतों, कारखानों और बाज़ारों में काम पर जाने के लिए. बाल मज़दूरी का उन्मूलन करने की दिशा में प्रगति दर्ज की गई है लेकिन इसके बावजूद, अनेक देशों में विशाल संख्या में बच्चों के लिए ये अब भी उनके दैनिक जीवन की सच्चाई है.