नृत्य, कथाएँ, शिल्पकला, खेल, पर्व, उत्सव, परम्पराएँ… ये अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, हमारे दैनिक जीवन में अनेक रूपों में प्रदर्शित होती है. ये हमसे पहले आई पीढ़ियों की धरोहर व उनका प्रतिबिम्ब होने के साथ-साथ वर्तमान में हमारी पहचान का सार भी हैं. हर वर्ष, 17 अक्टूबर को इसी विषय पर मनाया जाने वाला अन्तरराष्ट्रीय दिवस, इन जीवन्त विरासत का उत्सव मनाने और भावी पीढ़ियों के लिए उन्हें संरक्षित करने का एक अवसर है.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने शनिवार को 'अन्तरराष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दिवस' पर अपने सन्देश में कहा है कि जीवन्त विरासत का अस्तित्व इसीलिए है, चूँकि आमजन उसे जीवित रखते हैं.
“पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती ये परम्पराएँ व प्रथाएँ, समुदायों को निरन्तरता व अपनेपन का एहसास कराती हैं….इस दिवस पर यूनेस्को हमारे समुदायों और उनसे परे तक उपस्थित जीवन्त विरासत को मान्यता देता है और उसका जश्न मनाता है.”
यूनेस्को द्वारा स्थापित, मानवता की अमूर्त साँस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची इन परम्पराओं को अन्तरराष्ट्रीय पहचान देती है और उनके संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करती है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इनसे जुड़ी रहें.
भारत की समृद्ध साँस्कृतिक विरासत में त्योहारों, लोक गीतों, रीति-रिवाज़ों, पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर, प्राचीन कलाओं, और अनूठी परम्पराओं का विशेष स्थान है.
इस अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर, भारत की उन अनमोल विरासत पर एक नज़र, जिन्हें यूनेस्को की सूची में स्थान मिला है.
वर्ष 2025 में यूनेस्को की सूची में शामिल
दीयों की जगमगाहट, मिठाइयों की मिठास और अपनों के साथ ख़ुशियाँ बाँटने का पर्व है दीपावली.
अक्टूबर या नवम्बर में मनाया जाने वाला यह त्योहार, अंधकार पर उजाले और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है. यह साल की अन्तिम फ़सल और नए साल व नए मौसम की शुरुआत से भी जुड़ा हुआ है.
पीढ़ियों से चली आ रही यह परम्परा परिवारों और समुदायों को एक साथ जोड़ती है और आपसी प्रेम, आभार व आशा का सन्देश देती है.
वर्ष 2024 में यूनेस्को की सूची में शामिल
वसन्त और नव वर्ष के स्वागत में एशिया व मध्य पूर्व के कई देशों में नवरोज़ (नौरोज़) का त्योहार मनाया जाता है.
संगीत, नृत्य, पारम्परिक व्यंजन और खेल इसके प्रमुख आकर्षण हैं. मंगोलिया के कज़ाख़ समुदाय में लोग 22 मार्च को सूर्योदय का स्वागत करते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हैं और विशेष पकवान बनाते हैं.
प्रकृति से जुड़ा यह पर्व आपसी मतभेद भुलाकर मेलजोल, दोस्ती और एकजुटता बढ़ाने का सन्देश देता है.
वर्ष 2023 में यूनेस्को की सूची में शामिल
रंग-बिरंगे परिधान, तालियों की लय और गोल घेरे में थिरकते क़दम, गुजरात के गरबा नृत्य की ख़ास पहचान हैं. हर वर्ष, नवरात्रि के दौरान किया जाने वाला यह पारम्परिक नृत्य देवी शक्ति की आराधना से जुड़ा है.
नर्तक जलते हुए दीपक वाले मिट्टी के पात्र या देवी अम्बा की प्रतिमा के चारों ओर घूमते हैं और संगीत की रफ़्तार के साथ नृत्य भी तेज़ होता जाता है.
पीढ़ियों से चली आ रही यह परम्परा समुदायों को जोड़ती है और सामूहिक उत्सव की भावना को मज़बूती देती है.
वर्ष 2021 में यूनेस्को की सूची में शामिल
भव्य पंडाल, मिट्टी की प्रतिमाएँ और पारम्परिक ढोल की गूँज, दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता मानो एक विशाल कला उत्सव में बदल जाता है.
देवी दुर्गा की आराधना का यह दस दिवसीय पर्व कलाकारों और कारीगरों की रचनात्मकता को भी सामने लाता है, जो महीनों पहले से ही इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं.
उत्सव का समापन प्रतिमाओं के नदी में विसर्जन से होता है. यह पर्व विभिन्न सामाजिक और साँस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोगों को एक साथ लाता है.
वर्ष 2017 में यूनेस्को की सूची में शामिल
पवित्र नदियों के तट पर लाखों श्रद्धालुओं का संगम, कुम्भ मेले को दुनिया के सबसे बड़े शान्तिपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक बनाता है.
प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में, हर चार वर्ष में बारी-बारी से आयोजित इस मेले में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं. ऐसी मान्यता है कि पवित्र स्नान से पापों और जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है.
साधु-सन्तों, तीर्थयात्रियों और विभिन्न समुदायों की भागेदारी वाला यह आयोजन, सदियों पुरानी आध्यात्मिक और साँस्कृतिक परम्पराओं को जीवित रखता है.
वर्ष 2016 में यूनेस्को की सूची में शामिल
शारीरिक व्यायाम व आसन, साँस लेने की तकनीकें और ध्यान मुद्रा, भारत की प्राचीन योग परम्परा का आधार हैं.
योग तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन बनाकर शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर ज़ोर देता है.
गुरु-शिष्य परम्परा के साथ सदियों से चली आ रही यह विधा, आज दुनिया भर में लोकप्रिय है.
वर्ष 2014 में यूनेस्को की सूची में शामिल
पंजाब के जंडियाला गुरु में ठठेरा समुदाय के कारीगर, कई पीढ़ियों से ताम्बे और पीतल के बर्तन बनाते आ रहे हैं.
धातु को गर्म करके, हथौड़ों से पीटकर और पारम्परिक तरीक़ों से चमकाकर बर्तन, थालियाँ और अन्य उपयोगी वस्तुएँ तैयार की जाती हैं.
पिता से पुत्र तक पहुँचने वाली यह बारीक कारीगरी केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समुदाय की पारिवारिक परम्पराओं और साँस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है.
वर्ष 2013 में यूनेस्को की सूची में शामिल
भक्ति गीतों, ढोल की थाप और नृत्य के अनूठे मेल से मणिपुर की संकीर्तन परम्परा में भगवान कृष्ण की कथाएँ जीवन्त होती हैं.
वैष्णव समुदाय की यह पारम्परिक कला, धार्मिक पर्वों और जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों पर मन्दिरों और घरों के आँगनों में प्रस्तुत की जाती है.
यह परम्परा लोगों को एकजुट करती है और आस्था व साँस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती है.
वर्ष 2012 में यूनेस्को की सूची में शामिल
लद्दाख के मठों और गाँवों में बौद्ध धर्मग्रन्थों के मन्त्रों का सामूहिक पाठ सदियों पुरानी आध्यात्मिक परम्परा का हिस्सा है.
भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से जुड़े इन मन्त्रों के पाठ के दौरान घंटियों, ढोल, झाँझ और तुरहियों की ध्वनि भी गूँजती है.
वरिष्ठ भिक्षु, युवा भिक्षुओं को मन्त्रों के उच्चारण और पाठ की विधियाँ सिखाते हैं. यह परम्परा मन की शान्ति, आध्यात्मिक कल्याण और शुद्धि से जुड़ी है.
वर्ष 2010 में यूनेस्को की सूची में शामिल
पूर्वी भारत का छऊ नृत्य अपनी जोशीली मुद्राओं, पारम्परिक संगीत और आकर्षक मुखौटों के लिए प्रसिद्ध है. इसमें पौराणिक कथाओं और लोक कथाओं को नृत्य के ज़रिए प्रस्तुत किया जाता है.
इसकी तीन प्रमुख शैलियाँ सरायकेला, पुरुलिया और मयूरभंज से जुड़ी हैं, जिनमें पहली दो में मुखौटों का इस्तेमाल होता है.
रामायण, महाभारत और स्थानीय लोककथाओं से प्रेरित यह नृत्य, क्षेत्रीय उत्सवों और समुदायों की साँस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
वर्ष 2010 में यूनेस्को की सूची में शामिल
काले घाघरों में थिरकती नृत्यांगनाएँ और साँप की तरह लहराती मुद्राएँ, राजस्थान के कालबेलिया नृत्य की ख़ास पहचान हैं.
पुंगी और खंजरी की धुन पर होने वाला यह नृत्य, कालबेलिया समुदाय के साँप पकड़ने के पारम्परिक पेशे से प्रेरित है.
इसके लोकगीतों में पौराणिक कथाएँ और पीढ़ियों से चला आ रहा ज्ञान सहेजा गया है. मौखिक परम्परा से आगे बढ़ती यह कला, समुदाय की साँस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक है.
वर्ष 2010 में यूनेस्को की सूची में शामिल
देवी काली और दारिका दैत्य के बीच पौराणिक युद्ध की कथा, केरल की मुडियेट्टू परम्परा में नृत्य, संगीत और नाट्यकला के ज़रिए प्रस्तुत की जाती है.
देवी के मन्दिरों में हर साल आयोजित होने वाले इस अनुष्ठान में पूरा गाँव हिस्सा लेता है.
तैयारियों से लेकर मंचन तक, यह सामूहिक परम्परा धार्मिक मान्यताओं, कलात्मक हुनर और सांस्कृतिक मूल्यों को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने में मदद करती है.
वर्ष 2009 में यूनेस्को की सूची में शामिल
उत्तराखंड के सलूर-डुंग्रा गाँवों में मनाया जाने वाला रम्माण उत्सव, मुखौटा नृत्य, लोकगीत और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जाना जाता है.
भूमियाल देवता की आराधना से जुड़े इस पर्व में रामकथा और स्थानीय लोककथाओं को नृत्य एवं नाट्य प्रस्तुतियों के ज़रिए दर्शाया जाता है.
आयोजन में समुदाय के अलग-अलग समूह अपनी विशेष भूमिकाएँ निभाते हैं, जिससे क्षेत्र की साँस्कृतिक पहचान और साझा परम्पराएँ आगे बढ़ती हैं.
वर्ष 2008 में यूनेस्को की सूची में शामिल
आँखों के भावों, चेहरे की बारीक हरकतों और हाथों की मुद्राओं के ज़रिए कहानी कहने की यह कला, कुटियाट्टम की ख़ास पहचान है.
केरल की यह संस्कृत नाट्य परम्परा दो हज़ार वर्ष से भी अधिक पुरानी है, जिसमें शास्त्रीय नाटकों और स्थानीय कला का मेल देखने को मिलता है.
कलाकारों को अभिनय की इन बारीकियों में महारथ हासिल करने के लिए वर्षों तक कठिन प्रशिक्षण लेना पड़ता है. इसकी विस्तृत प्रस्तुतियाँ कई दिनों तक चल सकती हैं.
वर्ष 2008 में यूनेस्को की सूची में शामिल
हज़ारों वर्षों से वेदों के मन्त्र और पवित्र श्लोक मौखिक परम्परा के ज़रिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं.
इनके मूल स्वरूप को बनाए रखने के लिए उच्चारण, स्वर और लय के विशेष नियमों का पालन किया जाता है, जिनका अभ्यास बचपन से ही कराया जाता है.
वैदिक मन्त्रपाठ की अनेक प्राचीन शाखाएँ लुप्त हो चुकी हैं और एक हज़ार में से केवल 13 ही शेष हैं. ऐसे में इस अनमोल विरासत की बची हुई परम्पराओं को सहेजना और भी ज़रूरी हो गया है.
वर्ष 2008 में यूनेस्को की सूची में शामिल
संगीत, सम्वाद और अभिनय के ज़रिए रामलीला में भगवान राम की कथा और रावण के साथ उनके युद्ध को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है.
उत्तर भारत में दशहरे के त्योहार के दौरान होने वाली यह पारम्परिक नाट्यकला मुख्यतः गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस पर आधारित है. इसकी प्रस्तुति कई दिनों से लेकर कुछ स्थानों पर पूरे महीने तक चलती हैं.
अभिनय, गायन, वेशभूषा और मंच सज्जा में पूरे समुदाय की भागेदारी, रामलीला को एक साझा साँस्कृतिक उत्सव का रूप देती है.
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