1990 के दशक की आखिरी दौर में पोखरण-2 के बाद हमने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ मैगजीन में अपना साप्ताहिक कॉलम लिखा था। उस वक्त यह मुद्दा गर्म था कि अगर फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (FIIs) बाजार से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो क्या होगा। आम सहमति यह थी कि अगर सभी डॉलर भारत से बाहर निकल जाएं, तो भारत बर्बाद हो जाएगा। उस वक्त भी 1991 जैसे आर्थिक संकट का डर सता रहा था। हालांकि, मेरी सोच यह थी कि डॉलर के भारत से बाहर निकलने की संभावना नहीं के बराबर है