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जलवायु परिवर्तन को कई दशकों तक केवल एक तकनीकी समस्या माना जाता रहा, जिसे कार्बन बजट, तापमान लक्ष्य और उत्सर्जन के आँकड़ों के माध्यम से मापा जाता था. लेकिन, अब दुनिया यह मानने लगी है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय विफलता नहीं है, बल्कि यह एक गहन मानवाधिकार संकट भी है.