अपने घर, कामकाज, स्कूल और समुदाय से दूर हो जाना, और ये पता भी न होना कि कभी घर वापसी होगी भी या नहीं. विश्व भर में युद्ध, हिंसा और उत्पीड़न के कारण विस्थापित होने वाले 12.2 करोड़ लोगों की यही वास्तविकता है और यह संख्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने अपनी एक नई रिपोर्ट में चिन्ता जताई है कि मानवतावादी उद्देश्यों के लिए धन कटौती के कारण शरणार्थियों की सहायता के लिए संसाधन ख़त्म हो रहे हैं.