प्रकृति को बचाने के लिए दुनिया ने महत्वाकाँक्षी लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन क्या ज़मीनी स्तर पर उतनी ही तेज़ी से काम हो रहा है? संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ‘प्रकृति के विरुद्ध युद्ध’ समाप्त करने का आहवान किया है. इसी सन्देश के साथ सोमवार को आर्मीनिया की राजधानी येरेवान में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (कॉप17) शुरू हुआ.
19 से 30 अक्टूबर तक चलने वाले इस सम्मेलन में देश समीक्षा करेंगे कि प्रकृति के विनाश को रोकने और उसे बहाल करने के वैश्विक वादे किस हद तक पूरे हुए हैं और वर्ष 2030 की समयसीमा से पहले प्रयासों को कैसे तेज़ किया जाए.
जानिए, कॉप17 से जुड़े कुछ अहम तथ्य:
व्यापक तस्वीर: वर्ष 2022 में अपनाया गया कुनमिंग-मॉन्ट्रियाल वैश्विक जैव विविधता फ़्रेमवर्क प्रकृति के विनाश को रोकने और उसे बहाल करने की वैश्विक कार्ययोजना है. इसमें 2030 तक के लिए 23 और 2050 तक के लिए चार दीर्घकालिक लक्ष्य तय किए गए हैं.
इसका सबसे चर्चित लक्ष्य ‘30 by 30’ है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक पृथ्वी के कम से कम 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण किया जाना है. यही संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करने की समयसीमा भी है.
कार्ययोजना में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और आक्रामक प्रजातियों जैसी चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ संरक्षण के लिए धन जुटाने तथा पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली आर्थिक नीतियों में सुधार पर भी ज़ोर दिया गया है.
ज़मीनी हक़ीकत: कुछ प्रगति हुई है, लेकिन रफ़्तार अब भी लक्ष्य से पीछे है.
जैव विविधता सन्धि के 196 पक्षकारों में से लगभग 90 प्रतिशत ने राष्ट्रीय लक्ष्य तय कर लिए हैं. क़रीब 60 प्रतिशत ने राष्ट्रीय रणनीतियाँ और कार्ययोजनाएँ तैयार की हैं, जबकि 70 प्रतिशत से अधिक ने अपनी राष्ट्रीय रिपोर्ट सौंप दी हैं.
मगर, समीक्षा किए गए राष्ट्रीय लक्ष्यों में आधे से भी कम पर तय समयसीमा के अनुसार प्रगति हो रही है. पृथ्वी के 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण के लिए देशों के मौजूदा संकल्प भी अपर्याप्त हैं.
धन, तकनीकी क्षमता, विश्वसनीय आँकड़ों और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की कमी बड़ी बाधाएँ बनी हुई हैं.
यूएन महासचिव ने शुक्रवार को येरेवान में विश्व नेताओं से कहा, “2030 तक का आधा सफ़र तय हो चुका है. येरेवान अब हमारे लिए जवाबदेही तय करने का अवसर है.”
यह क्यों अहम है: सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वादों को ठोस कार्रवाई में बदलना है.
सम्मेलन में मुख्य रूप से इन छह मुद्दों पर चर्चा होगी:
मेज़बान देश आर्मीनिया चाहता है कि कॉप17 केवल प्रगति की समीक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस फ़ैसलों और कार्रवाई का रास्ता भी खोले.
आर्मीनिया के संयुक्त राष्ट्र राजदूत परुयर होवहानिस्यान ने यूएन न्यूज़ से कहा, “हम यह मानकर नहीं चल सकते कि 2030 की समयसीमा अभी बहुत दूर है. येरेवान में लिए गए फ़ैसलों से वादों और ज़मीनी नतीजों के बीच की दूरी कम होनी चाहिए.”
देश के पर्यावरण मंत्री और कॉप17 के आगामी अध्यक्ष हम्बार्दज़ुम मातेवोस्यान के अनुसार, कॉप15 में वैश्विक कार्ययोजना बनी, कॉप16 में उसके क्रियान्वयन की व्यवस्थाएँ आगे बढ़ीं और अब कॉप17 में यह परखा जाएगा कि क्या काम कर रहा है, कहाँ कमियाँ हैं और आगे क्या बदलना होगा.
जैव विविधता का क्षरण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे भोजन, पानी और स्वच्छ हवा से सीधे जुड़ा है.
महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने विश्व नेताओं को याद दिलाया कि जीवन की ये बुनियादी ज़रूरतें प्रकृति पर निर्भर हैं.
गुरुवार को जारी संयुक्त राष्ट्र की एक अहम रिपोर्ट ने वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों पर अब तक की प्रगति और कमियों को उजागर किया.
जैव विविधता सन्धि की कार्यकारी सचिव एस्ट्रिड शोमेकर ने कहा, “हम जानते हैं कि अब तक कितनी प्रगति हुई है और कहाँ कमियाँ रह गई हैं. अब ज़रूरत है कि हम मिलकर इन कमियों को दूर करें.”
येरेवान सम्मेलन की सबसे बड़ी कसौटी यही है: क्या दुनिया प्रकृति को बचाने के वादों को समय रहते वास्तविक नतीजों में बदल पाएगी?