संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, आपदाओं के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता लोगों की जान बचाने और राहत सहायता जुटाने में अहम भूमिका निभाती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि न्यूयॉर्क टाइम्स में आपदा पर प्रकाशित एक लेख के बाद अतिरिक्त 5 लाख डॉलर की आधिकारिक सहायता मिली.
संयुक्त राष्ट्र की साँस्कृतिक एजेंसी UNESCO की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 और मानवाधिकारों से लेकर जलवायु कार्रवाई व भूकम्प राहत तक, पत्रकारिता लोगों की जान बचाने और हानिकारक फ़र्ज़ी ख़बरों का मुक़ाबला करने में अहम भूमिका निभाती है. रिपोर्ट का शीर्षक है – ‘पत्रकारिता का मूल्य: अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संकटों में मीडिया क्यों अहम है – वैश्विक प्रमाण’.
रिपोर्ट के अनुसार, विश्वसनीय मीडिया भ्रामक सूचनाओं का मुक़ाबला करने के साथ-साथ सरकारों की जवाबदेही बढ़ाता है, प्रभावित समुदायों तक सहायता पहुँचाने में मदद करता है और अधिकारियों को कार्रवाई के लिए प्रेरित करता है.
अच्छी पत्रकारिता आपात ज़रूरतों एवं आपदाओं से निपटने के प्रयासों को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाने में भी मदद करती है.
UNESCO के अनुसार, आलोचनात्मक पत्रकारिता मानवीय सहायता क्षेत्र की निगरानी में भी अहम भूमिका निभाती है, जिससे कमियों को उजागर करने, सुधार लाने और राहत प्रयासों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है. UNESCO दुनिया भर में मीडिया एवं सूचना साक्षरता को बढ़ावा देता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पर्यावरण से जुड़ी पत्रकारिता, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के बेहतर संरक्षण में योगदान दे सकती है.
मिसाल के तौर पर, थाईलैंड में एक ऑनलाइन पत्रिका ने कचरा भराव स्थल से अपशिष्ट जल छोड़े जाने की ख़बर प्रकाशित की, जिसके बाद अधिकारियों ने कार्रवाई की. वहीं, युगांडा में अवैध रेत खनन पर पत्रकारों की पड़ताल के बाद देशभर में इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.
झूठे दावे, अफ़वाहें और भ्रामक सूचनाएँ संकटों को और गम्भीर बना सकती हैं. इससे समुदायों की आपदाओं के लिए तैयारी करने, उनसे निपटने और बाद में पुनर्बहाली की क्षमता कमज़ोर होती है. इनके कारण ज़रूरतमन्द लोगों तक सहायता पहुँचने में भी बाधा आ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, ग़लत रिपोर्टिंग हिंसक टकराव को बढ़ावा दे सकती है और राहतकर्मियों के ख़िलाफ़ हिंसा का कारण भी बन सकती है.
कोविड-19 जैसे स्वास्थ्य संकटों के दौरान भ्रामक सूचनाओं से भारी नुक़सान हुआ. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे “सूचना महामारी”(infodemic) का नाम दिया.
एक अध्ययन के अनुसार, अकेले अमेरिका में 2021 में लगभग 23 लाख लोग भ्रामक सूचनाओं की वजह से कोविड-19 की चपेट में आए और 66 हज़ार लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई.
इससे अस्पताल में भर्ती पर 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त ख़र्च हुआ और लगभग 45 हज़ार ऐसी मौतें हुईं, जिन्हें रोका जा सकता था.
वहीं, विश्वसनीय पत्रकारिता झूठे दावों का मुक़ाबला करने और विशेषज्ञों की सलाह लोगों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाती है.
रिपोर्ट के अनुसार, समाचारों से लोगों को बड़े पैमाने पर दान देने की प्रेरणा भी मिल सकती है.
ब्रिटिश पत्रकार माइकल बर्क की 1984 में इथियोपिया के अकाल पर BBC के लिए की गई रिपोर्टिंग का इतना असर हुआ कि राहत प्रयासों के लिए 20 करोड़ डॉलर से अधिक की धनराशि जुटी.
2015 में तुर्की की फ़ोटो पत्रकार नीलूफ़र देमिर ने डूबकर मारे गए बच्चे एलन कुर्दी की तस्वीर खींची. इस तस्वीर ने सीरिया में जारी युद्ध की ओर दुनिया का ध्यान खींचा. इसके बाद दान में तेज़ बढ़ोत्तरी हुई और कुछ ग़ैर-सरकारी संगठनों को मिलने वाली वित्तीय सहायता 50 गुना तक बढ़ गई.
पत्रकारिता राहत सहायता क्षेत्र के भीतर बड़े सुधारों का रास्ता भी खोल सकती है. #AidToo मामले में पत्रकारों ने हैती में सत्ता के दुरुपयोग और दण्डमुक्ति की संस्कृति को उजागर किया, जिसमें Oxfam और Save the Children जैसे ग़ैर-सरकारी संगठन शामिल थे.
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